कुछ बातें गौर करने लायक

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अभी मैंने एक किताब पढ़ी। मुद्राराक्षस जी ने संपादित की। किताब का नाम था, 21वीं सदी सर्वश्रेष्ठ दलित कहानियां..। छोटी-छोटी कहांनियों का संग्रह। एक बात गौर करने लायक थी.. कुछ को छोड़कर इसके सारे लेखक दलित थे..। अभय तिवारी जी ने अपने ब्लाग में एक लेख को स्थान दिया। लेखक- फरीद खान.. शर्मनाक है मुसलमानों के नाम पर राजनीति। आज ही चोखेर बाली में एक लेख को स्थान दिया गया है.. लेखिका- रश्मि सरस.. गाय दूध देती है।

सभी लेख कुछ मुद्दों को उठाती हैं। जरूरी हैं यह सब मुद्दे लेकिन…

जब ऐसे लेख और कहानियों को मैं पढ़ता हूं..सोचता हूं.. क्या यह लेख इनलोगों के द्वारा तब भी लिखे जाते जब यह दलित, मुसलमान या फिर महिला नहीं होते..। खुद ही यह भी सोच लेता हूं कि शायद हां.. लेकिन कई बार नहीं भी..।

अगड़ी जाति का क्यों कोई दलित पर नहीं लिखता। हिन्दू जागरूक महिलाएं क्यों मुसलमानों पर नहीं लिखती.. जागरूक मुसलमान क्यों महिला पर नहीं लिखता…??

स्वार्थ है यह एक तरह का..
स्वार्थी हैं हम सब..
अपनी बेहतरी के लिए कलम चलाते हैं..
खर्च करो रोशनाई कभी..
स्वार्थ से उपर उठकर

झूठ बोलतीं हैं महिलाएं..

हां, यही सच है, अधिकांश महिलाएं झूठ ही बोलती हैं। साथ में शराब भी पीती हैं, कपड़े भी भड़काऊ पहनती हैं और झूठ भी बोलती हैं।

यही कहा जा रहा है ब्रिटेन में। एक रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार के 100 मामले में केवल 5 मामले में आरोपी दोषी साबित हो पाता है। इसकेउलट महिलाओं पर इल्जाम लगता है कि वह बलात्कार को लेकर झूठ बोलती हैं।

यह वही ब्रिटेन है, जहां के कानून पूरे विश्व के कानून को एक दिशा देता है। वकील और जज वहां के केस की स्टडी करते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में हर साल बलात्कार के 14000 मामले सामने आते हैं, जिसमें से हर 20 में से 19 आरोपी रिहा हो जाते हैं।

इसके पीछे कैसी-कैसी दलील दी जाती हैं, जरा गौर फरमाएं:
बलात्कार का कोई चश्मदीद नहीं होता है।
किसी भी क्लोज शर्किट कैमरे में कोई तस्वीर नहीं मिलती।
लड़की खुद नशे में होती है।

यह कोर्ट में कही जाती हैं, जो बाहर कही जाती हैं, कुछ स्टीरियोटाईप ही है

लड़की ने भड़काऊ कपड़े पहने हुए थे।
लड़की ने उत्तेजित किया था।
उसपर से यह बात कही जाती है कि बढ़ते हुए बलात्कार के केस को देखते हुए छेड़छाड़ और ऐसी ही घटनाओं पर पुलिस ज्यादा तवज्जो नहीं देती।

नोट: मैने जो कुछ भी लिखा है, वह न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट और वाल स्टीर्ट जर्नल पर लिखे गए एक ब्लाग को पढ़कर लिखा है।

मुंह दिखाई 5 रुपए!!!

नई नई दुल्हन, सारे अड़ोस पड़ोस की महिलाये दुल्हन को देखने आई. दुल्हन ने भी घूंघट डाल रखा था. परम्परा जो सालो से चली आ रही थी, उसे कहते दुल्हन परछना. चावल जो हल्दी में रंगे हुए थे. थाली से उठाना और दुल्हन के घूँघट के ऊपर डाल देना. और उसके बाद पैसे देना.

बात मैं इसी की कर रहा हू… यह काम महिलाए करती हैं और नाम लिखने वाला महिला को पहचान उनके पति का नाम लिख देती हैं या फ़िर घर का जो पुरूष मुखिया हो उसका (महिला अपना नाम क्यों नही लिखवाती या लिखने वाला उनका नाम क्यों लिखता यह अलग चर्चा का विषय है) कोई देता है १५१, कोई केवल ५१ तो कोई ११ और कोई ५. हा मुंह दिखाई ५ वो भी इस ज़माने में(जब मुद्रास्फिती ५ से ६ और ६ से ७ और उससे भी आगे भाग रही है ) हा तो दुल्हन को परछने के बाद पास बैठे लड़के को ५ रूपये दिए. लड़के ने पति का नाम लिखने के बाद ५ रुपए लिख दिया. लड़का हैरान परेशान की ये ५ रुपए देने का क्या तुक है.

तो मैं अब तुक समझा दूँ. १२ साल पहले इस घर की महिला ने उस घर की दुल्हन को परछने के बाद ५ रुपए दिए थे. वो बात याद रखते हुए उस घर की महिला ने इस घर में आई दुल्हन को ५ रुपए वापस लौटा दिए.

ये आज भी होता है, मुझे हँसने की वजह मिली सो मैंने सोचा आप भी हंस ले…

कुछ स्टीरियोटाईप सोच: अंतिम भाग

पिछली पोस्ट में बेंगाणी जी ने कहा कि यह अपवाद हैं। उनके इस बात पर केवल इतना कहूंगा कि अपवाद उनके दिमाग में हैं। या अगर वह किस्मत को मानते हैं तो किस्मत के खोटे हैं, जिन्हें ऐसे लोग नहीं मिले। मैं किस्मत को नहीं मानता, कर्म को मानता हूं। मुझे ऐसे लोग मिले हैं।

खर, बात आगे बढ़ायी जाए।

चैत्र महीना में जेठ जैसी गर्मी पड़ रही थी। बाइक पर चलता हुआ मनोरंजन पूर्वी दिल्ली के विकास मार्ग पर 50 की स्पीड से गाड़ी चला रहा था। और तभी उसकी बाईक हुडुक हुडुक के साथ हिचकोले खाई। उसे पता चल गया पेट्रोल खत्म होने वाला है। मुश्किल से अब वह और एक किलोमीटर गाड़ी से जा सकता था। एक्सीलेरेटर पर उसका पंजा थोड़ा और तेज हुआ। लेकिन गाड़ी बंद हो गई थी। एक्सीलेरेटर ने आपना काम करना बंद कर दिया था। थोड़े देर बाद ही गाड़ी ने अपनी गति भी खो दी। मनोरंजन गाड़ी में बैठे हुए ही अपने पैर से धक्का दे गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था। तभी पीछे से एक वर्दीधारी ने बाइक में चलते हुए अपने बाएं पैर से मनोरंजन की बाइक को धक्का देना शुरू किया। उसने बिना कहे पेट्रोल पंप तक उसकी गाड़ी को धक्का दिया।

मनोरंजन को सहज यह एहसास नहीं हो रहा था कि एक पुलिस वाले ने ऐसा किया। कई बार सड़क पर अपनी गाड़ी को धक्का दे रहे लोगों के पास से तो मनोरंजन भी गुजरा था। लेकिन उसने यह जहमत कभी नहीं उठाई थी।

पुलिस भी अच्छा सोचते हैं और हमारी आपकी तरह खराब और अच्छे भी हो सकते है।

लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुघर्टना के बाद इसकी जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा सौंप दिया था। फिर एक और जमाना आया जब टाइम्स आफ इंडिया के आर के नारायणण ने एक काटरून में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री के बारे में काटरून बनाया। सुखराम अपने आफिस में बैठे हुए थे। चारों तरफ रुपये बिखरा हुआ था। अलमारी में, टेबल पर, फर्श पर, फाइलों के उपर-नीचे, हर जगह। सुखराम अपनी सीट में बैठे हुए कहते हैं, अरे कोई है जो मुझे एक सफेद प्लेन कागज दे, जिससे मैं यह बता सकूं कि मैं निदरेष हूं। झारखंड के रामगढ़ जिला के एक स्थानीय नेता ने एक लड़के को पढ़ाने का पूरा जिम्मा लिया हुआ है।

नेता ईमानदार भी होते हैं और भ्रष्ट भी।

महिलाएं बोलती हैं ठीक उसी तरीके से जैसे मर्द बोलते हैं ज्यादा।

मुझे किसी आजकल के लड़के ने कहा कि आजकल की लड़कियां मोबाइल पर बात ही करती रहती हैं। जब देखो मोबाइल। मैंने उससे कहा क्या बता सकते हो किससे बात करती हैं, उसने कहा लड़के से। मैंने कहा फिर तो आजकल के लड़के भी जब देखो मोबाइल पर ही बात करते रहते होंगे।

यह सब हमारे आपके कुछ स्टीरियोटाइप सोच हैं। इसी स्टीरियोटाईप से बाहर निकलिए। किसी पूर्वाग्रह में हो कर चीजों को मत देखिए।

कुछ स्टीरियोटाईप सोच

इत्र केवल मुसलमान लगाते हैं।
मुसलमान भारत को नहीं पाकिस्तान को पसंद करते हैं।
बिहारी चालाक और राजनीति करने वाले होते हैं।
सभी लड़कियां सेक्सी होती हैं।
पुलिस हमेशा खराब होता है।
नेता कभी वादा नहीं निभाते।
औरतें खूब बोलती हैं।
युवा लड़कियां मोबाइल फोन पर सबसे ज्यादा बात करती हैं।

मैं ऐसा नही सोचता। कैसे? पूरा पोस्ट पढ़िये।

चांदनी चौक में रहने वाले शर्मा जी दरीबां की एक छोटी सी दुकान से अपने एक रांची दोस्त (जो दूसरे शर्मा जी हैं) के लिए इत्र खरीदतें हैं। अपने रांची प्रवास के दौरान शर्मा जी सबकुछ भूल जाएं, इत्र नहीं भूलते।

इत्र कोई भी लगा सकता है। शर्मा जी भी और अख्तर साहब भी।

अखबार के एक दफ्तर में पहले ट्वेंटी-20 फाइनल का टीवी में प्रसारण चल रहा था। मुकाबला था इतिहास में एक ही देश कहलाने वाले और वर्तमान के तथाकथित दो दुश्मनों देशों के खिलाफ। मैच का अंतिम ओवर धोनी के चहेते जोगिंदर शर्मा कर रहे थे.. आखिरी गेंद.. और भारत मैच जीत गई। पाकिस्तान हार गया। दफ्तर में शांत रहने वाले मुसलमान नियाज ने हिंदू सोभन का गाल चूम लिया। ..और पैसे मिलाकर मिठाई मंगाई गई लेकिन मुसलमान नियाज ने सबसे ज्यादा 100 रुपये मिलाए।

भारतीय मुसलमान भारत को प्यार करते हैं और वह भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े प्रशंसकों में से एक होते हैं।
यूं तो इस आफिस में भी कुछ नया नहीं था। कुछ भी नया नहीं था से मेरा मतलब कि दिल्ली के हरेक आफिसों की तरह इसमें भी बिहारियों की संख्या सबसे ज्यादा थी। कोस्मोपोलिटन दिल्ली में वह कोस्मोपोलिटन पत्रिका नहीं पढ़ते। प्रवीण झा भी इसी आफिस का हिस्सा है। मध्यम वर्ग परिवारों में होने वाले मूल्यों को लेकर चलने वाला। आफिस में उसे लोग कभी-कभी झा.अुआ कह कर पुकारते। इसका तुक तो प्रवीण को भी नहीं समझ में आता। झा को झा.अुआ कहना, समझ से परे की चीज है। उसकी प्रकृति उसकी निजी थी, किसी प्रांत और इलाके से अलग(सभी की प्रकृति उसकी निजी व्यवहार पर ही होती है, प्रांत और इलाके से अलग)।

बिहारी भी सीधे होते हैं और राजनीति को समझते हैं और नहीं भी समझते।

तीसरे माले में रहने वाले कुछ लड़के तो सड़क से आने जाने वाली हर लड़की को सेक्सी कहते। उनके जेहन में लड़कियां सेक्सी ही होती हैं, जैसा कुछ बैठा हुआ है।

बस में चलते हुए उसी तीसरे माले में रहने वाले एक लड़का, विकास का सामना एक लड़की से हुआ। जिसके बाद वह बस से यह बुदबुदाते हुए उतरा, इसके तो सिंग उगे हुए थे, लड़ने को ही घर से निकली थी।

हुआ कुछ यूं था। बस ने हल्का हिचकोला खाया और विकास का जूता, लड़की के बस की फर्श पर रगड़ खा रही दुप्पटे को खिंच गया (अनजाने में हुआ था यह)। दुप्पटा पूरा नीचे। लड़की ने उसे देखते हुए कहा, आंखे नहीं हैं क्या? देख कर नहीं खड़े हो सकते हैं क्या?
अगले स्टाप पर बस में भीड़ थोड़ी और बढ़ गई। बस ने एक हिचकोला और खाया। विकास लड़की से टकराते-टकराते.. टकरा ही गया। कुछ अंग्रेजी और हिंदी, लड़की ने विकास को इतना सुना दिया कि सभी यात्री विकास को ही देखने लगे। अगला स्टाप विकास का स्टाप था। वह कुछ बुदबुदाते हुए उतर रहा था।

बाकी की बातें अगले पोस्ट में लिखूंगा

गालियों के केंद्र में महिला क्यों?

इस ओर कभी ख्याल ही नहीं गया था। किसी ने बातों बातों में कहा और मैं सोचने लगा। हिंदी में दी जाने वाली ज्यादातर गालियों में महिलाओं को केंद्र में रखा जाता है।

 गालियों का दिमागशास्त्र लिखते वक्त भी मैंने यह सोचा था कि सबसे गाली किसने दी होगी। लेकिन अब तो बात यह है कि दी होगी तो क्या सोचकर ऐसी बात कही होगी कि सामने वाले को सबसे ज्यादा बुरा लगे। इंसानी दिमाग का एक कड़वी सच्चाई है कि उसकी पहचान(आईडेंटिटी)पर सवाल उठाईये, वह बौखला जाएगा।

 गालियों में महिलाओं को केंद्र में रखने का भी यही समझ हो सकता है। पुरुष अगर भावनात्मक रूप से किसी से सबसे ज्यादा जुड़ा होता है तो वह हैं, मां, पत्नी और बेटी। और आप पाएंगे कि गालियों में उसी को सबसे ज्यादा टारगेट किया गया है।

 यह बात हर उस समाज या भाष की है, जहां महिलाओं का पलड़ा पुरुषों के मुकाबले हल्का होता है। यह काफी निंदनीय है। अव्वल तो गाली ही बात करने की विषय नहीं है और उसके बाद आप ऐसी गाली दे रहे होते हैं जिसे सीधे औरतों से जोड़ दिया जाता है।

 पता नहीं कब वह समय आएगा जब इंसान इसे बदल पाएगा!!

महिलाएं: पुरुषों की दृष्टि से

ओरकुट में एक कम्यूनिटी है आई हेट एकता कपूर। इस कम्यूनिटी के हजारों सदस्य हैं, पुरुष और महिला दोनों लेकिन कम्यूनिटी बनाने वाला पुरुष है। एकता कपूर के धारावाहिकों को देखकर ही लोग कहते हैं कि महिलाओं की समझ पुरुषों के मुकाबले कम होती हैं (यह बात इससे भी पहले से कही जा रही है)।

मां, बहन, बेटी, पत्नी और ऐसे ही ना जाने कितने रिश्तों में महिलाओं से हमारा संबंध होता है। और सभी रिश्तों के साथ भावना जुड़ी होती है इन सबके बावजूद पुरुषों को हमेशा लगा है कि महिलाओं के पास व्यावहारिक ज्ञान कम होता है और शैक्ष्णिक ज्ञान ज्यादा। मुझे अच्छे से याद है कि मेरे स्कूल की टापर भी तो लड़की ही थी, उससे पहले वाले साल में भी और उससे पहले वाले में भी। शायद यही किस्सा हम आप में से सभी के यहां हुआ होगा। और नहीं हुआ होगा तो कोई बात नहीं सीबीएसई में हमेशा से होता रहा है।

लड़कियों या महिलाओं के बारे में एक बात और मशहूर है, उनकी बातें। जैसे मेरी मां। खूब बातें करती है। यहां की बातें, वहां की बातें। मुझे पसंद है लेकिन और महिलाओं का करना पसंद नहीं। (मां से भावनात्मक रिश्ता जो है)। आफिस में, घर पर हर जगह बातें करने को तैयार होती है। मोबाइल फोन तो उनका सबसे अच्छा दोस्त हो चला है। एक दिन बिना खाए रह सकती हैं लेकिन एक दिन बिना फोन के, इंपासिबल।

यह या तो चीजों को बना सकती हैं या फिर तीन-तेरह, नौ-अट्ठारह। घर-घर नहीं रहेगा, आफिस-आफिस नहीं। यही इनका सबसे सबल पक्ष है और सबसे भयावह भी। मैंने कितने टूटे घरों को इनको जोड़ते देखा है और कई घरों को तोड़ते हुए।

भारत में यही देवी हैं और यही चंडी भी। शीशे में उतारने की कला इनसे अच्छा कोई नहीं जानता। अगर यह निभाती हैं तो सात जन्मों के लिए और अपने पर उतर आए तो सात जन्मों तक आपको यह नानी की याद दिलाती रहेंगी।

पुरुष हमेशा इनकी निजी जिंदगी के बारे में जानने को इच्छुक रहा है। लेकिन यह कभी यह नहीं जानने देना चाहता है कि मैं जानना चाहता हूं। पुरुष जितना महिलाओं से दूर जाना चाहता है ठीक उसके उलट वह उनसे जुड़ी चीजों को जानना चाहता है। महिलाओं की बातें, उनके कपड़े, उनके आभूषण। सभी चीजें। बड़ी बारीक नजर से उनकी पड़ताल करना चाहता है। अपने दोस्तों से पूछता है, लंबी बातें चलती हैं। लेकिन यह अनढका सच उन्हें मिल नहीं पाता।

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपर कई लोग महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। लेकिन महिलाएं क्या चाहती हैं। मैंने जितनी बातें की है उस आधार पर महिलाएं खुद दो भागों में बंटी होती हैं। वैसी महिलाएं जो अपने पैरों पर खड़ी है, बहुधा चाहती है कि हमें कोई आरक्षण नहीं चाहिए, हम अपने हक के लिए लड़ेगें। और वो जो घर में काम काजी हैं लेकिन शिक्षित हैं, उन्हें महिलाओं का हक चाहिए। महिला आरक्षण बिल चाहिए।

पुरुषों के लिए आज भी महिला कमतर कर के आंकी जाने वाली चीज है। जितनी काबलियत है, उससे कम। इसमें केवल पुरुष ही नहीं कभी-कभी महिलाएं स्वयं भी होती है। उत्तर भारत में लिंग विभेद और कन्या भ्रूण हत्या के मामले इसकी पुष्टि करतें हैं। एक मां को भी पहले बेटा चाहिए, बेटी नहीं। बेटा हो गया तो सिर का दर्द कम हो जाता है।

भारतीय समाज और भारतीय पुरुष की मानसिकता हमेशा महिलाओं को कम आंकती आई हैं लेकिन आशा है कि यह मानसिकता समय के साथ बदल जाए। काश! यह समय जल्दी आ जाए।

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