समाज

indian societyअभी नेपथ्य से किसी ने आवाज़ लगाई
मंच पर तो कोई भी नही था
तमाशबीन बहुधा थे
एक हुंकार हुई
और सब चले गए

हिंदू परंपराएं जो मर गई, कुछ मरने वाली हैं

हम भारतवासी अपने देश, अपनी संस्कति, अपनी परंपराएं पर गर्व करते हैं। हिंदूओं में यह बात तो और भी ज्यादा है। परंपराओं को लेकर इनका मानना है कि जो भी बनाई गई हैं बेहतरी के लिए बनाई गई है। सबका अपना एक मतलब है और लाभ भी।

अभी कुछ दिन पहले यह देखने को मिला तो बात याद आ गई सो लिख रहा हूं।

पिता अपनी बेटी के यहां आते हैं। गांव से। बेटी ने सबसे पहले उनके पांव धोये, आटा गूथने वाले बरतन में। तौलिये से उनका पांव पोंछा। पिता झोले में कुछ लाए थे, मां ने घर से कुछ बना कर दिया था। थोडी देर आराम करने के बाद पिता जाने को हुए। बेटी के घर का कुछ नहीं खाया। कहते हैं, बेटी के घर का कुछ नहीं खाना चाहिए।

और वह घर को चले गए।

मैं सोचता रहा, क्या इसके भी कोई मायने हैं। परंपरा तो है। तो जिस पर हम गर्व करते थे, वह आज धीरे-धीरे मर गया। लोगों को याद भी नहीं है। चलन से बाहर हो गया।

यह बात अलग है कि समय के साथ सबको चलना चाहिए। मैं इससे परहेज नहीं करता लेकिन वैसे जो परंपराओं को लेकर दंभ भरते हैं, और उसके बावजूद उन्हें कई परंपराएं मालूम ही नहीं।

क्या आपको मालूम है की कुछ और परम्पराये मर रही हैं?

कुछ स्टीरियोटाईप सोच: अंतिम भाग

पिछली पोस्ट में बेंगाणी जी ने कहा कि यह अपवाद हैं। उनके इस बात पर केवल इतना कहूंगा कि अपवाद उनके दिमाग में हैं। या अगर वह किस्मत को मानते हैं तो किस्मत के खोटे हैं, जिन्हें ऐसे लोग नहीं मिले। मैं किस्मत को नहीं मानता, कर्म को मानता हूं। मुझे ऐसे लोग मिले हैं।

खर, बात आगे बढ़ायी जाए।

चैत्र महीना में जेठ जैसी गर्मी पड़ रही थी। बाइक पर चलता हुआ मनोरंजन पूर्वी दिल्ली के विकास मार्ग पर 50 की स्पीड से गाड़ी चला रहा था। और तभी उसकी बाईक हुडुक हुडुक के साथ हिचकोले खाई। उसे पता चल गया पेट्रोल खत्म होने वाला है। मुश्किल से अब वह और एक किलोमीटर गाड़ी से जा सकता था। एक्सीलेरेटर पर उसका पंजा थोड़ा और तेज हुआ। लेकिन गाड़ी बंद हो गई थी। एक्सीलेरेटर ने आपना काम करना बंद कर दिया था। थोड़े देर बाद ही गाड़ी ने अपनी गति भी खो दी। मनोरंजन गाड़ी में बैठे हुए ही अपने पैर से धक्का दे गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था। तभी पीछे से एक वर्दीधारी ने बाइक में चलते हुए अपने बाएं पैर से मनोरंजन की बाइक को धक्का देना शुरू किया। उसने बिना कहे पेट्रोल पंप तक उसकी गाड़ी को धक्का दिया।

मनोरंजन को सहज यह एहसास नहीं हो रहा था कि एक पुलिस वाले ने ऐसा किया। कई बार सड़क पर अपनी गाड़ी को धक्का दे रहे लोगों के पास से तो मनोरंजन भी गुजरा था। लेकिन उसने यह जहमत कभी नहीं उठाई थी।

पुलिस भी अच्छा सोचते हैं और हमारी आपकी तरह खराब और अच्छे भी हो सकते है।

लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुघर्टना के बाद इसकी जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा सौंप दिया था। फिर एक और जमाना आया जब टाइम्स आफ इंडिया के आर के नारायणण ने एक काटरून में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री के बारे में काटरून बनाया। सुखराम अपने आफिस में बैठे हुए थे। चारों तरफ रुपये बिखरा हुआ था। अलमारी में, टेबल पर, फर्श पर, फाइलों के उपर-नीचे, हर जगह। सुखराम अपनी सीट में बैठे हुए कहते हैं, अरे कोई है जो मुझे एक सफेद प्लेन कागज दे, जिससे मैं यह बता सकूं कि मैं निदरेष हूं। झारखंड के रामगढ़ जिला के एक स्थानीय नेता ने एक लड़के को पढ़ाने का पूरा जिम्मा लिया हुआ है।

नेता ईमानदार भी होते हैं और भ्रष्ट भी।

महिलाएं बोलती हैं ठीक उसी तरीके से जैसे मर्द बोलते हैं ज्यादा।

मुझे किसी आजकल के लड़के ने कहा कि आजकल की लड़कियां मोबाइल पर बात ही करती रहती हैं। जब देखो मोबाइल। मैंने उससे कहा क्या बता सकते हो किससे बात करती हैं, उसने कहा लड़के से। मैंने कहा फिर तो आजकल के लड़के भी जब देखो मोबाइल पर ही बात करते रहते होंगे।

यह सब हमारे आपके कुछ स्टीरियोटाइप सोच हैं। इसी स्टीरियोटाईप से बाहर निकलिए। किसी पूर्वाग्रह में हो कर चीजों को मत देखिए।

कुछ स्टीरियोटाईप सोच

इत्र केवल मुसलमान लगाते हैं।
मुसलमान भारत को नहीं पाकिस्तान को पसंद करते हैं।
बिहारी चालाक और राजनीति करने वाले होते हैं।
सभी लड़कियां सेक्सी होती हैं।
पुलिस हमेशा खराब होता है।
नेता कभी वादा नहीं निभाते।
औरतें खूब बोलती हैं।
युवा लड़कियां मोबाइल फोन पर सबसे ज्यादा बात करती हैं।

मैं ऐसा नही सोचता। कैसे? पूरा पोस्ट पढ़िये।

चांदनी चौक में रहने वाले शर्मा जी दरीबां की एक छोटी सी दुकान से अपने एक रांची दोस्त (जो दूसरे शर्मा जी हैं) के लिए इत्र खरीदतें हैं। अपने रांची प्रवास के दौरान शर्मा जी सबकुछ भूल जाएं, इत्र नहीं भूलते।

इत्र कोई भी लगा सकता है। शर्मा जी भी और अख्तर साहब भी।

अखबार के एक दफ्तर में पहले ट्वेंटी-20 फाइनल का टीवी में प्रसारण चल रहा था। मुकाबला था इतिहास में एक ही देश कहलाने वाले और वर्तमान के तथाकथित दो दुश्मनों देशों के खिलाफ। मैच का अंतिम ओवर धोनी के चहेते जोगिंदर शर्मा कर रहे थे.. आखिरी गेंद.. और भारत मैच जीत गई। पाकिस्तान हार गया। दफ्तर में शांत रहने वाले मुसलमान नियाज ने हिंदू सोभन का गाल चूम लिया। ..और पैसे मिलाकर मिठाई मंगाई गई लेकिन मुसलमान नियाज ने सबसे ज्यादा 100 रुपये मिलाए।

भारतीय मुसलमान भारत को प्यार करते हैं और वह भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े प्रशंसकों में से एक होते हैं।
यूं तो इस आफिस में भी कुछ नया नहीं था। कुछ भी नया नहीं था से मेरा मतलब कि दिल्ली के हरेक आफिसों की तरह इसमें भी बिहारियों की संख्या सबसे ज्यादा थी। कोस्मोपोलिटन दिल्ली में वह कोस्मोपोलिटन पत्रिका नहीं पढ़ते। प्रवीण झा भी इसी आफिस का हिस्सा है। मध्यम वर्ग परिवारों में होने वाले मूल्यों को लेकर चलने वाला। आफिस में उसे लोग कभी-कभी झा.अुआ कह कर पुकारते। इसका तुक तो प्रवीण को भी नहीं समझ में आता। झा को झा.अुआ कहना, समझ से परे की चीज है। उसकी प्रकृति उसकी निजी थी, किसी प्रांत और इलाके से अलग(सभी की प्रकृति उसकी निजी व्यवहार पर ही होती है, प्रांत और इलाके से अलग)।

बिहारी भी सीधे होते हैं और राजनीति को समझते हैं और नहीं भी समझते।

तीसरे माले में रहने वाले कुछ लड़के तो सड़क से आने जाने वाली हर लड़की को सेक्सी कहते। उनके जेहन में लड़कियां सेक्सी ही होती हैं, जैसा कुछ बैठा हुआ है।

बस में चलते हुए उसी तीसरे माले में रहने वाले एक लड़का, विकास का सामना एक लड़की से हुआ। जिसके बाद वह बस से यह बुदबुदाते हुए उतरा, इसके तो सिंग उगे हुए थे, लड़ने को ही घर से निकली थी।

हुआ कुछ यूं था। बस ने हल्का हिचकोला खाया और विकास का जूता, लड़की के बस की फर्श पर रगड़ खा रही दुप्पटे को खिंच गया (अनजाने में हुआ था यह)। दुप्पटा पूरा नीचे। लड़की ने उसे देखते हुए कहा, आंखे नहीं हैं क्या? देख कर नहीं खड़े हो सकते हैं क्या?
अगले स्टाप पर बस में भीड़ थोड़ी और बढ़ गई। बस ने एक हिचकोला और खाया। विकास लड़की से टकराते-टकराते.. टकरा ही गया। कुछ अंग्रेजी और हिंदी, लड़की ने विकास को इतना सुना दिया कि सभी यात्री विकास को ही देखने लगे। अगला स्टाप विकास का स्टाप था। वह कुछ बुदबुदाते हुए उतर रहा था।

बाकी की बातें अगले पोस्ट में लिखूंगा

जिंदगी की चाह और जिंदगी की राह

आप जो सोचते हैं वह जिंदगी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जिंदगी नहीं। जिंदगी वह जो आपके साथ हो रहा है।

मेरा कोई दोस्त अपनी अपनी सरकारी बैंक की नौकरी को छोड़ चाट्र्ड अकाउंटेंट की तैयारी करने की सोच रहा है। उसने मुझे बताया, बरबस मेरे मन में ख्याल आया कि..

जो सवाल हर बच्चे से किया जाता है, कभी मुझसे भी किया गया था। क्या बनना चाहते हो। बड़ी धुंधली सी याद है, मैंने कहा, पायलट। प्लेन में उड़ना, इतनी ही समझ थी पायलट को लेकर। और वह पायलट कलम, हमेशा साथ भी तो रखता था। अच्छी यादें हैं।

वह पायलट की याद अब समय के साथ मद्धिम हो रही थी और मेरी पढ़ाई भी। इंजीनियर को लेकर मेरे मन में कुछ अच्छी तस्वीर नहीं बन रही थी और दसवीं पास होने के बाद मैंने कामर्स ले लिया।

गोस्सनर कालेज, रांची की बिल्डिंग बड़ी सुंदर थी उतनी अच्छी मेरी अकाउंटस में समझ नहीं थी। शाम के धुंधलके में हम कुछ दोस्त सीए और सीएस की बातचीत करते थे। वो रुतबा, वो सिग्नेचर की स्टाइल। काफी कुछ लुभाता था। लेकिन दूसरे साल में मैंने यह कहना शुरू कर दिया था कि अकाउंट्स में कमांड नहीं बन रहा है। और पास होते ही हर बिहारी(तब तक झारखंड अलग नहीं हुआ था, उसके दूसरे साल झारखंड अलग हो गया) की तरह यूपीएससी और आईएएस के बीच में सही अंतर जाने हुए भी आईएएस की सोचने लगा। पटना कालेज में एडमिशन के बाद जिंदगी एकदम से तेज हो गई थी जो मेरी पकड़ से बाहर थी। कालेज को छोड़ना पूरी जिंदगी के सोच में शामिल नहीं थी लेकिन जिंदगी में यह शामिल हो गया।

उसके बाद आईएएस की सोच भी छूटी लेकिन दिल्ली का साथ पकड़ लिया इस बीच अर्थशास्त्र से स्नातक पूरी हो चुकी थी।

कहीं काम करते हुए पूरा देश घूम चुका था। कई समझ अंकुरित हो रही थी जो पूरे पेड़ का रूप ले ही रही थी कि दैनिक जागरण में कब आ गया पता भी नहीं चला।

पूरी जिंदगी का मजा ले रहा हूं और जहां पड़ाव मिले वह असल में मेरे लिए पड़ाव नहीं ब्रेकर जैसे थे। मैंने चलना नहीं छोड़ा। और आज सबके सामने हूं।

छोटी नहीं, बड़ी जिंदगी और मजेदार जिंदगी के मजे लीजिए।

गालियों के केंद्र में महिला क्यों?

इस ओर कभी ख्याल ही नहीं गया था। किसी ने बातों बातों में कहा और मैं सोचने लगा। हिंदी में दी जाने वाली ज्यादातर गालियों में महिलाओं को केंद्र में रखा जाता है।

 गालियों का दिमागशास्त्र लिखते वक्त भी मैंने यह सोचा था कि सबसे गाली किसने दी होगी। लेकिन अब तो बात यह है कि दी होगी तो क्या सोचकर ऐसी बात कही होगी कि सामने वाले को सबसे ज्यादा बुरा लगे। इंसानी दिमाग का एक कड़वी सच्चाई है कि उसकी पहचान(आईडेंटिटी)पर सवाल उठाईये, वह बौखला जाएगा।

 गालियों में महिलाओं को केंद्र में रखने का भी यही समझ हो सकता है। पुरुष अगर भावनात्मक रूप से किसी से सबसे ज्यादा जुड़ा होता है तो वह हैं, मां, पत्नी और बेटी। और आप पाएंगे कि गालियों में उसी को सबसे ज्यादा टारगेट किया गया है।

 यह बात हर उस समाज या भाष की है, जहां महिलाओं का पलड़ा पुरुषों के मुकाबले हल्का होता है। यह काफी निंदनीय है। अव्वल तो गाली ही बात करने की विषय नहीं है और उसके बाद आप ऐसी गाली दे रहे होते हैं जिसे सीधे औरतों से जोड़ दिया जाता है।

 पता नहीं कब वह समय आएगा जब इंसान इसे बदल पाएगा!!

गालियों का दिमागशास्त्र

गाली। सबसे पहले किसने किसे दी होगी? क्यों दी होगी? कब दी होगी? मैं ना तो इनके जवाब जानता हूं और ना ही कोई इच्छा है कि जानूं। लेकिन गाली देने वाले का दिमागशास्त्र क्या होता होगा? क्या सोच बरबस ही उसके जबान में गाली आ जाती होगी?

जो मैं समझ पाता हूं, उसका एक सीधा समझ यह होता है कि गाली देने वाला वैसा कुछ चाहता नहीं है, जैसा उस गाली का मतलब होता है। बचपन से यहां-वहां सुनता हुआ वह बढ़ता है और गुस्सा आने पर बरबस ही गाली निकल आती है।

गुस्सा, कुंठा, रौब जमाना या यूं कह लें कि संस्कार की कमी के कारण ही गाली उसके जबान पर आती है। (हो सकता है कई और कारण से भी आते हों)।

हमारे हिंदी ब्लाग जगत में भी गाली देने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ रही है। उन सभी लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि उस उर्जा को कहीं और अच्छी जगह लगाएं। कृप्या गालियां ना दें। आशा है आप सभी लोग मेरी भावना को समझ कर इसका पालन करने की कोशिश करेंगे।

इस पंक्ति को याद रखें: इंसान दूसरे के बारे में जब कह रहा होता है तो वह दूसरे से ज्यादा अपने बारे में बता रहा होता है कि मैं क्या हूं।

महिलाएं: पुरुषों की दृष्टि से

ओरकुट में एक कम्यूनिटी है आई हेट एकता कपूर। इस कम्यूनिटी के हजारों सदस्य हैं, पुरुष और महिला दोनों लेकिन कम्यूनिटी बनाने वाला पुरुष है। एकता कपूर के धारावाहिकों को देखकर ही लोग कहते हैं कि महिलाओं की समझ पुरुषों के मुकाबले कम होती हैं (यह बात इससे भी पहले से कही जा रही है)।

मां, बहन, बेटी, पत्नी और ऐसे ही ना जाने कितने रिश्तों में महिलाओं से हमारा संबंध होता है। और सभी रिश्तों के साथ भावना जुड़ी होती है इन सबके बावजूद पुरुषों को हमेशा लगा है कि महिलाओं के पास व्यावहारिक ज्ञान कम होता है और शैक्ष्णिक ज्ञान ज्यादा। मुझे अच्छे से याद है कि मेरे स्कूल की टापर भी तो लड़की ही थी, उससे पहले वाले साल में भी और उससे पहले वाले में भी। शायद यही किस्सा हम आप में से सभी के यहां हुआ होगा। और नहीं हुआ होगा तो कोई बात नहीं सीबीएसई में हमेशा से होता रहा है।

लड़कियों या महिलाओं के बारे में एक बात और मशहूर है, उनकी बातें। जैसे मेरी मां। खूब बातें करती है। यहां की बातें, वहां की बातें। मुझे पसंद है लेकिन और महिलाओं का करना पसंद नहीं। (मां से भावनात्मक रिश्ता जो है)। आफिस में, घर पर हर जगह बातें करने को तैयार होती है। मोबाइल फोन तो उनका सबसे अच्छा दोस्त हो चला है। एक दिन बिना खाए रह सकती हैं लेकिन एक दिन बिना फोन के, इंपासिबल।

यह या तो चीजों को बना सकती हैं या फिर तीन-तेरह, नौ-अट्ठारह। घर-घर नहीं रहेगा, आफिस-आफिस नहीं। यही इनका सबसे सबल पक्ष है और सबसे भयावह भी। मैंने कितने टूटे घरों को इनको जोड़ते देखा है और कई घरों को तोड़ते हुए।

भारत में यही देवी हैं और यही चंडी भी। शीशे में उतारने की कला इनसे अच्छा कोई नहीं जानता। अगर यह निभाती हैं तो सात जन्मों के लिए और अपने पर उतर आए तो सात जन्मों तक आपको यह नानी की याद दिलाती रहेंगी।

पुरुष हमेशा इनकी निजी जिंदगी के बारे में जानने को इच्छुक रहा है। लेकिन यह कभी यह नहीं जानने देना चाहता है कि मैं जानना चाहता हूं। पुरुष जितना महिलाओं से दूर जाना चाहता है ठीक उसके उलट वह उनसे जुड़ी चीजों को जानना चाहता है। महिलाओं की बातें, उनके कपड़े, उनके आभूषण। सभी चीजें। बड़ी बारीक नजर से उनकी पड़ताल करना चाहता है। अपने दोस्तों से पूछता है, लंबी बातें चलती हैं। लेकिन यह अनढका सच उन्हें मिल नहीं पाता।

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपर कई लोग महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। लेकिन महिलाएं क्या चाहती हैं। मैंने जितनी बातें की है उस आधार पर महिलाएं खुद दो भागों में बंटी होती हैं। वैसी महिलाएं जो अपने पैरों पर खड़ी है, बहुधा चाहती है कि हमें कोई आरक्षण नहीं चाहिए, हम अपने हक के लिए लड़ेगें। और वो जो घर में काम काजी हैं लेकिन शिक्षित हैं, उन्हें महिलाओं का हक चाहिए। महिला आरक्षण बिल चाहिए।

पुरुषों के लिए आज भी महिला कमतर कर के आंकी जाने वाली चीज है। जितनी काबलियत है, उससे कम। इसमें केवल पुरुष ही नहीं कभी-कभी महिलाएं स्वयं भी होती है। उत्तर भारत में लिंग विभेद और कन्या भ्रूण हत्या के मामले इसकी पुष्टि करतें हैं। एक मां को भी पहले बेटा चाहिए, बेटी नहीं। बेटा हो गया तो सिर का दर्द कम हो जाता है।

भारतीय समाज और भारतीय पुरुष की मानसिकता हमेशा महिलाओं को कम आंकती आई हैं लेकिन आशा है कि यह मानसिकता समय के साथ बदल जाए। काश! यह समय जल्दी आ जाए।

जीवन के वास्‍तविकता की कहानी

पहली बार हवाई जहाज चढ़ने का अहसास उसके दिल के अंदर के साथ उसके चेहरे पर भी साफ झलक रहा था। इकोनोमिक क्लास में भी सफर करते हुए उसे बिजनेस क्लास के नियमित यात्री से ज्यादा खुशी हो रही थी। शायद वह इस यात्रा को अपने जीवन के अब तक के सबसे खुशी पल के बारे में बताने वाला था। वह बहुत कुछ कहना चाहता था। बहुत कुछ बताना चाहता था।

और फिर.. यह क्या? उसने जैसे ही खिड़की से नीचे झांका, पूरी धरती उसे समतल दिखाई दे रही थी। गड्ढे व टीले सब समतल। जो थोड़ा ऊंचा लग रहा था वह था एक छोटी पहाड़ी। वह भी धीरे-धीरे ऊंचे जाने पर समतल हो गई। यह तो उसने कभी सोचा ही नहीं था।

अब वह बड़ा हो चुका था। ओहदा बड़ा, पैसे ज्यादा, लंबी गाड़ी, बड़ा बंगला और वह सब कुछ..। लेकिन उसने उस पहली हवाई यात्रा से सीख नहीं ली। वह छोटे और बड़ों के फर्क को नहीं मिटा पाया। जमीन पर उतरकर वह उसे और बड़ा करता रहा। सुबह गाड़ी सफाई करते ड्राइवर के साथ, तपती धूप में ट्रैफिक सिग्नल के पास खड़े किताब बेचते लड़कों के साथ और आफिस में आफिस स्टाफ्स के साथ।

आसमान में बैठा वह जो सभी को समतल देख रहा था बड़ा बनते ही फर्क करना सीख गया। यह वास्तविकता के करीब की कहानी है।

राम का नाम यानि उम्र 40 से ऊपर

यह भी मजेदार है। आपका नाम भी आपके बारे में सबकुछ नहीं तो बहुत कुछ बता जाता है। अगर ना मिले तो अपवाद माना जा सकता है।

नाम के आगे राम लगा है तो उम्र तो 40 पार होगी ही। नाम में नाथ लगा है तो 50 पार। कुछ नाम तो ऐसे हैं कि अगर हजार लोगों की भीड़ है और आप पत्थर फेंक दें तो पत्थर उसी नाम वालों में से किसी एक का सर फोड़ देगी। रवि, सुनील, दीपक, सुमन, मीना, सीमा.. ऐसे ही कुछ नाम हैं। इसकी संख्या आप भी बढ़ा सकते हैं।

क्या कहा.. प्रत्युश। मुमकिन है लड़का दस साल से छोटा होगा। अपाला नाम की लड़की भी दस साल से छोटी होगी। नाम से उम्र का पता तो चलता ही है, आपका सामाजिक परिवेश, माता-पिता की शैक्षणिक योग्यता का भी अनुमान लगाया जा सकता है।

मेरा एक दोस्त मुझसे हमेशा लड़के और लड़कियों के नए नाम पूछता रहता है। मैं भी उसे गूगलिंग कर नाम झट बता देता हूं। दीपक, अजीत, विशाल जैसे नाम अब नहीं चलते। पता नहीं नाम रखते हुए लोगों को ऐसे नाम क्यों चाहिए होते हैं जिसका मतलब विरलों को ही पता हो। मेरा नाम राजेश रोशन है। अब राजेश नाम बच्चे के माता-पिता के साथ बुआ और मौसी को हलक से नहीं उतरता। राजेश!!! यह भी कोई नाम है राजेशश्श्श्श्। हुंह। ऐसी कुछ प्रतिक्रिया मिलती है।

राज के नाम पर सभी खुश हो जाते हैं। राज, क्या नाम है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। लेकिन उनके नाम को कोई ग्रहण नहीं करना चाहता। कृष्ण। नहीं चलेगा। हां!! कृष्ण के ही कुछ ऐसे नाम बताओ जो लोगों को ना पता हो, जिसे बोलने में जीभ को थोड़ी मेहनत करनी पड़ती हो।

तो अगर किसी टीवी न्यूज चैनल के एंकर की तरह कहूं तो कहा जा सकता है कि..

जाहिर तौर पर नाम बस नाम नहीं है। इसके भी कई मायने होते हैं। नाम का अपना मिजाज होता है। फिलहाल तो हम आपको यही कह सकते हैं कि राम का नाम बुलंद है लेकिन इसे ग्रहण कब कौन करेगा, देखने वाली बात है।