गजनी @ Regal

बुधवार को 650 पेड प्रिव्‍यू के साथ रीलीज हुई गजनी ने आम लोगों के बीच गुरुवार को ही अपनी जगह बना ली थी. इस बार साप्‍ताहिक छुट्टियां शुक्रवार और शनिवार को होने का कारण मैंने भी गजनी देखने की सोची… इंटरनेट पर सर्च मारा तो पता चला कि गजनी कि टिकटें ही नहीं बिक रहीं है….एडवांस बुकिंग के कारण्‍ा टिकटें पहले ही बिक चुकी थीं…और जो बिक रही थी वह फर्स्‍ट या सेकेंड पक्ति की… फिर मुझे रीगल में टिकट मिली और वहीं की मैंने दो टिकट बुक करा ली…

 यह भी एक अच्‍छा अनुभव रहा… सिंगल थियेटर में फिल्‍म देखने का… मल्‍टीप्‍लेक्‍स का जमाना है बड़े शहर के लोग सिंगल थियेटर कहां जा पाते हैं…वो छोटे फिल्‍म के पोस्‍टर Now Showing के बोर्ड में… ट्यूब लाइट की रोशनी में… अंदर जाते ही आपका स्‍वागत शिखर गुटखा खा रहा, अपने हाथा में AA की बैटरी वाला टार्च लिए आपकी टिकट देखते हुए कहता है…यहां सात सीट छोड़कर….रीगल में बड़े दिनों बाद यह अनुभव हुआ…

 बैठते हुए समझ में आ गया था कि सीट एक कोने से फट रही है और इसके अंदर नारियल के रेशे हैं… भला हो आमिर खान का कि फिल्‍म अच्‍छी बनाई थी…

लोगों की तालियां और सीटियों के बीच मैं फिल्‍म देख रहा था… फिल्‍म को हिंसक बनाया गया है… यह एक कंप्‍लीट एंटरटेनमेंट फिल्‍म है. रोमांस, गाने और लड़ाई वाली फिल्‍म.

आमिर खान के साथ अभिनेत्री असीन ने भी जबरदस्‍त काम किया है. कभी-कभी तो लगता है कि आमिर पर भारी पड़ रही है लेकिन आपके इस विचार को गलत करने के लिए आमिर जैसे ही सीन में आते हैं आप अपना मन फिर बदल देते हैं.

कुल मिलाकर ऐसे एक्‍शन मिथुन की फिल्‍मों में होते हैं लेकिन उसके दर्शक वर्ग समाज का कोई दूसरा वर्ग होता है इसलिए वह फिल्‍म नहीं देखी जाती. उन फिल्‍मों में और गजनी में केवल अंतर स्क्रिप्‍ट और एक्‍टर का है. बाकि मसाला फिल्‍म वो भी होती है यह भी है…

चोर मार्केट का प्रोमोशन

मजेदार और विचार करने वाली घटना हुई। मेरा एक जिगरी यार है, अजीत कुमार। पेशे से वकील है। किसी फर्म के लिए काम करता है। तनख्वाह क्भ्000 रुपये। आज सुबह जब आफिस के लिए निकला तो नीचे से फोन कर कहता है, गाड़ी चोरी हो गई। होंडा साईन है उसके पास। नीचे आकर देखा तो गाड़ी का अगला पहिया किसी चोर ने चुरा लिया था।

मेरा दोस्त आफिस नहीं गया। किन्हीं कारणों से उसे इंशोयेरेन्स क्लेम नहीं पा रहा। कहता है, आज टायर सेट लेना पड़ेगा। दुकान गया, आपबीती बताई, टायर सेट की कीमत पूछी।

यहां से शुरुआत होती है ट्विस्ट। दुकानदार ने चोर बाजार के लिए प्रोमोट किया। कहा, आधी कीमत में वहां से मिल जाएगा। वहीं से जाकर ले लो। अजीत ने मुझे फोन मिलाया, पूछा, क्या करूं?

मैंने कहा, चोर बाजार से खरीदने का मतलब है। चोरों को प्रोमोट करना। बाजार से ले लो। मैंने फिर कहा, चाहो तो चोर बाजार से ले सकते हो लेकिन एक बार मेरी बात सोचना..।
आप क्या सोचते हैं? आप क्या सलाह देंगे या फिर आप क्या करेंगे? ज्यादा जरूरी है कि आप क्या करेंगे?

कुछ बातें गौर करने लायक

eclipse

अभी मैंने एक किताब पढ़ी। मुद्राराक्षस जी ने संपादित की। किताब का नाम था, 21वीं सदी सर्वश्रेष्ठ दलित कहानियां..। छोटी-छोटी कहांनियों का संग्रह। एक बात गौर करने लायक थी.. कुछ को छोड़कर इसके सारे लेखक दलित थे..। अभय तिवारी जी ने अपने ब्लाग में एक लेख को स्थान दिया। लेखक- फरीद खान.. शर्मनाक है मुसलमानों के नाम पर राजनीति। आज ही चोखेर बाली में एक लेख को स्थान दिया गया है.. लेखिका- रश्मि सरस.. गाय दूध देती है।

सभी लेख कुछ मुद्दों को उठाती हैं। जरूरी हैं यह सब मुद्दे लेकिन…

जब ऐसे लेख और कहानियों को मैं पढ़ता हूं..सोचता हूं.. क्या यह लेख इनलोगों के द्वारा तब भी लिखे जाते जब यह दलित, मुसलमान या फिर महिला नहीं होते..। खुद ही यह भी सोच लेता हूं कि शायद हां.. लेकिन कई बार नहीं भी..।

अगड़ी जाति का क्यों कोई दलित पर नहीं लिखता। हिन्दू जागरूक महिलाएं क्यों मुसलमानों पर नहीं लिखती.. जागरूक मुसलमान क्यों महिला पर नहीं लिखता…??

स्वार्थ है यह एक तरह का..
स्वार्थी हैं हम सब..
अपनी बेहतरी के लिए कलम चलाते हैं..
खर्च करो रोशनाई कभी..
स्वार्थ से उपर उठकर

राग-ए-बुलेट, राग-ए-यामाहा, राग-ए-बजाज…

Royal Enfield

यह सारे राग तानसेन के राग मल्हार से मिलते जुलते है। इसकी महत्ता को हर गाड़ीवान समझ पाएगा.. कल भी समझता था, आज भी समझ रहा है और समझता रहेगा..। यह गाड़ी प्रेम है। आपके पास कौन सी बाईक है, या थी? उसकी एक आवाज..खास आवाज..खास गंध होती है। इंसान भी समझते हैं और घर का कुत्ता भी..।

एक समय बुलेट का हुआ करता था..क्या शान थी..गांवों, मोहल्लों में पूरे 5-7 किमी तक लोग जानते थे कि फलां बुलेट में चलता है..। लोगबाग तब पूरी दुनिया को दो भाग में बांट देते थे, एक जिसने बुलेट चलाई हो..दूसरा वह जिसने बुलेट नहीं चलाई हो। स्टार्ट करने के नाम पर शर्त लग जाते थे..। लाल और हरे निशान में लगा कांटे को मिलाना फिर डरते-डरते किक मारना..।

बुलेट की आवाज एक किमी तक तो सुनाई पड़ती ही थी। घर की औरतों के लिए वह सायरन का काम करता था। घर के बच्चे पढ़ने लगते थे.. औरतें उस काम या उस कमरे में चली जाती थी, जहां उस वक्त उस समय में उनको होना चाहिए था।

अब मुझे कभी-कभी बुलेट बड़ा ही सामंती लगता है। फिर सोचता हूं.. मंहगाई ने सामंती बुलेट की वाट लगा दी है।

तब बुलेट की सवारी पुलिस या फिर कुछ जमींदार परिवार ही किया करते थे। अलग रौब के साथ..। आज भी लेते उनके ही प्रतीकात्मक लोग ले रहे हैं..लेकिन गाडि़यों की भीड़ ने बुलेट की छवि को थोड़ा धुंधला किया है..

रायल एनफील्ड..यही नाम तो है लेकिन लोग केवल बुलेट जानते थे.. बुलेट

अगली कड़ी में यामाहा आरएक्स 100

मैक् डी और हमारा समाज

indian youth….

दक्षिण दिल्ली का एक पाश इलाका, साउथ एक्स और वहां पर अमेरिका के कैलिफोर्निया के एक बहुराष्ट्रीय कंपनी मैक् डोनाल्ड का एक छोटा सा रेस्त्रां। इसके साथ हमारा यंगिस्तान इंडिया..।

हर दौर की एक पीढ़ी होती है। उसका एक मिजाज होता है। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल से लेकर नरसिंह राव के प्रधानमंत्री काल तक..एक पीढ़ी जवान हो रही थी। नरसिंह राव के प्रधानमंत्री काल से वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक.. एक और पीढ़ी जवान हो रही है। आज का युवा सेल में नाईकी के स्टोर से टी शर्ट खरीद कर पहनता है। तब, युवा कपड़ा खरीद कर नजदीक के दर्जी दुकान से सिला कर पहनता था। आज का अक्षत अपने पिता संजय से ज्यादा कमाता है।
और संजय जब अक्षत की उम्र का था तो अपने पिता रामकिशोर से पैसे मांग कर कपड़े सिलवाता था (संजय को पैसे मांगते हुए बहुत बुरा लगता था)।

आमिर खान के बदलते स्टाईल की तरह हमारी पीढ़ी और हमारा समाज भी बदल रहा है। कई चीजे गलत हो रही हैं तो कई सही भी..। अपना-अपना नजरिया है।

प्रेम विवाह बढ़े हैं।
तलाक के मामले भी बढ़े हैं।
औरतें पहले के मुकाबले जागरूक हुई हैं।
जातिगत खाई में थोड़ी मिट्टी भरी गई है।

हमारे पाठक कितने बदले हैं। चाहे वह पिता की भूमिका में हो, पत्नी या फिर आज के यंगिस्तान हों। आप क्या सोचते हैं..?

अक्षत प्रेम विवाह को सही मानता है। उसे इसमें कोई बुराई नहीं दिखती।
अक्षत के पिता संजय प्रेम विवाह को समाज का हिस्सा नहीं मानते, फिल्म तक सही है।
रामकिशोर संजय के पिता और अक्षत के दादा जी फिल्मों में भी इसे सही नहीं मानते।

उनका कहना है, बेटी और वोट अपने जाति वाले को ही दी जाती है। दिल्ली में रहने वाला एक युगल अपने घरों में झूठ बोलता है। वह प्रेम विवाह करना चाहते है लेकिन जाति को लेकर हमेशा कहते हैं मेरे डैड नहीं मानेंगे। वह तो बर्दाश्त ही नहीं करेंगे। ..और उफ्फ निकल जाता है। वह अपने घर वालों के बारे में आपस में कहते हैं, आज भी हमारे घरवाले जाति और धर्म को मानते हैं। शादी होगी तो अपनी ही जाति में। लड़के/लड़की की इच्छा हो या ना हो..।

एक मेंटल ब्लाकेज है.. आज भी है.. पता नहीं कब तक रहेगा।

समाज का डर

dark societyभूत-प्रेत से बड़ा है यह डर। कोई काला जादू नहीं लेकिन डर है कि लोग फुसफुसाते हुए भी डरते हैं। यह समाज का डर है। इससे डरते सभी लोग है। इसका मंतर अभी कम लोग सीख पाए हैं। सो डरते रहते हैं। कुछ सीख रहे हैं, कुछ सीखेंगे। धीरे-धीरे..।

उसकी बेटी ने प्रेम विवाह कर लिया।
उसके घर लड़का आता है।

यह फुसफुसहाट है। समाज के अंदर समाज के लोगों की ही। समाज में मान और शान की इतनी फिक्र होती है कि लोग समाज से डरने लगते हैं। किसी घर की लड़की अपनी दादी की मौत में श्मशान घाट जाना चाहती है। चली भी जाती है। और उसके बाद शुरू होता है समाज की फुसफुसाहट..। उसकी लड़की…

मुझे याद है जब मैंने अपना मूंछ साफ कर लिया था। डर तो मेरे अंदर भी था, समाज का। कौन, क्या-क्या बोलेंगे? घर वालों ने कुछ नहीं कहा। मां, पापा, भईया, दीदी किसी ने नहीं। एक पिता के दोस्त ने गौर से पहले देखा..। एक बुजुर्ग मेरे दूर के दादा जी लगते थे, कहा.. इतना पढ़ने के बाद भी तुमलोगों को जब यह ज्ञान नहीं है, तो हमलोग कैसे सिखाएंगे! मैं समाज के डर से चुप रहा। कुछ भी तो नहीं बोला था मैंने।

समाज का डर कई रूप में सामने आता है, कई रूप में आता रहेगा। समाज जरूरी है, कहीं बिखर ना जाए इसलिए इस समाज के डर को करीने से तोड़ने की जरूरत है।

जाने तू.. या जाने ना

मेरे 29 साल के दोस्त ने फिल्म देखने के बाद कहा, फिल्म अच्छी है लेकिन हमारे उम्र की नहीं है। सोचा मैं भी देख आऊं। कल का दिन मेरा छुट्टी का दिन होता है। टिकट ली और हो आया जाने तू..या जाने ना।

वो क्या कहते हैं कालेज गोअर्स की फिल्म है। सब यंग यंग। लगेगा देखने के बाद कहूं, क्या मस्त फिल्म बनाई है! फिल्म स्टोरी टेलिंग के जरिए आगे बढ़ती रहती है। फिल्म की अभिनेत्री जिनेलिया की पहली हिन्दी फिल्म तुझे मेरी कसम, जो रितेश देशमुख की पहली फिल्म से मिलती जुलती है।

छ: दोस्तों का एक समूह। जिसे हीरो और हीरोइन दोस्त हैं लेकिन उन्हें प्यार नहीं है। सूरज बड़जात्या की ब्लाकब्लस्टर फिल्म मैंने प्यार किया का एक डायलाग मेरे दिमाग में आ जाता है, एक लड़की और एक लड़का कभी केवल दोस्त नहीं रह सकते।

आमिर खान की पहली फिल्म कयामत से कयामत तक का लुक भी देखने को मिलेगा। हीरो ठाकुर है। राजस्थान के रांजौर इलाके का राठौर। जय सिंह राठौर(इमरान खान)। और हीरोइन करोड़पति बाप की अकेली लड़की। इस फिल्म में परिवार किसी भी चीज की मनाही नहीं करता है। किसी भी चीज की नहीं। प्यार करो, नाइट पार्टी करो, डांस करो, मस्ती करो.. सब कुछ मजा मस्ती है। काम करना है तो करो.. नहीं करना है मत करो। हीरोइन का भाई अमित(प्रतीक बब्बर, राज बब्बर और स्मिता पाटिल का छोटा बेटा) कोई काम नहीं करता। कहता है अमीर होने का एक ही फायदा है, कोई काम मत करो।

आज के समाज या शायद आने वाले समाज की हल्की सी झलक है यह फिल्म जाने तू.. या जाने ना।

घर की याद और कुछ बातें झारखंड की

घर से लौट कर आया हूं। जेठ की दुपहरी की तरह हैं अभी घर की यादें। एक दम कड़क। ताजा-ताजा। घर से चलते वक्त का अंतिम खाना.. कौर ठीक से अंदर नहीं जाता। आज भी.. और तब भी होता था जब घर से पहली बार निकला था।

एक जुलाई की रात झारखंड एक्सप्रेस से जा रहा था, दो को घर पहुंचना था लेकिन दो जुलाई को झारखंड बंद, तीन जुलाई को भारत बंद। पहले ट्रेन का रूट बदला और फिर बारिश और बंद ने सुहाने सफर को आह-आउच सा बना दिया।

तीन अहले सुबह किसी तरीके घर पहुंचा। लेकिन घर पहुंचने के बाद किसी तरीके से आह-आउच वाली स्थिति वाह-वाह हो गई। मेरी छह महीने की भतीजी का हंसता हुआ चेहरा जो दिखा। भतीजी का नाम उसकी बुआ ने माही रखा है। पूरा घर माही-माही से गुंजायमान रहता है।
इसी बीच मुझे लग रहा था मैं कुछ मिस कर रहा हूं, सोच रहा था आलोक पुराणिक ने आज संडे स्पेशल यू हीं कुछ लिखा होगा.. अपने डाक्टर साहब(अनुराग जी) ने भी अपने यादों के पेड़ को झकझोरा होगा, कुछ पत्ते सहज रूप से गिरे होंगे। पुराने लेकिन ताजा-ताजा से लगने वाले।
प्रमोद सिंह अजदक वाले ने कुछ आलापा होगा, जिसे मैं एक बार पढ़ता हूं फिर दूसरी बार पढ़ने पर समझ पाता हूं। तब पता चलता है कि कितनी बड़ी बात लिखी गई है। ठीक ऐसे ही ना जाने कितनों के बारे में सोचा और अपने दोस्तो को बताया..।

इन सब पलों में मेरा कैमरा मेरे साथ था। फोटो लिए, फ्लिकर पर अपलोड किया। मेरे पत्रकार दोस्त ने इसे देखकर कहा, मैंने ऐसी हरियाली तो कहीं देखी ही नहीं है। मैंने कहा झारखंड के नाम में हरियाली है। झार=झाड़=झाडि़यां, पेड़-पौधे.. rajeshroshan

झारखंड के बनने से बहुत कुछ बदल गया है। बहुत कुछ..। इस अमीर राज्य के गरीब जनता के साथ कितना अच्छा हो रहा है कितना बुरा..यह एक अलग बहस का हिस्सा है।

मेरे लिए तो मेरा झारखंड जैसा भी अच्छा है। कई बुराईयां जिसे मिटाना होगा। झारखंड बंद झारखंड का सबसे सफल हथियार सा नजर आता है। इसे बदलना होगा। कब और कैसे इसका मुझे ज्ञान नहीं लेकिन इतना पता है कि इस अमीर राज्य के लोगों को दिल से, मन से और जेब से अमीर बनना है तो झारखंड बंद को बंद करना होगा।

स्वाद और भूख

पहला दृश्य…

पेट तो भरा हुआ था लेकिन कुछ स्वादिष्ट खाने की इच्छा हो रही थी. पहले का आर्डर किया हुआ खतम भी नही हुआ था. पूरे एक हफ्ते बाद बाहर खाना खाने आए थे. आइसक्रीम का आर्डर दिया गया. वो भी पुरा खत्म नही हुआ. …और अंत में बचा हुआ खाना वेटर उठा कर ले गया

दूसरा दृश्य…

उसी होटल के बाहर से रात को गुजर रहा था. वेटर बचे हुए खाने की बड़ी पालीथीन फेंकने जा रहे थे. कोने पर बैठा हुआ इंसान ताक में था. वेटर ने खाना कोने में बिखेर दिया. दूसरे कोने में बैठा इंसान देखता रहा. वेटर गए और वह से खाना चुनकर वही से उठाये एक पेपर प्लेट में डाल खाने लगा.

रेड लाईट एरिया की सेक्स वर्कर

Red Light Areaकोई हर दिन मारा जा रहा है
…और कोई इसे ही लाइफ बन गई बता रहा है
ये बुझने के बाद और भड़कने वाली आग है
कोई जानबूझकर तो कोई जबरदस्ती झोंका जा रहा है.
ये मर्ज है या दवा?
इसकी खोज ख़बर किया नही जा रहा है.
डाक्टर अनुराग जी के पोस्ट से प्रेरित