वोट और बेटी अच्‍छे इंसान को देना चाहिए…

ऑफिस से लेकर सड़क तक सब राजनीति ही करते हैं. मेरा कैब ड्राइवर कहता है मैं तो अपना वोट अपनी जात वाले को ही दूंगा किसी और को देने का सवाल ही नहीं उठता. फिर कहता है फलां हमारी जात वाला है वह चाहे घोटाला क्‍यों ना करें लेकिन वोट तो मैं उसे ही दूंगा… ड्राइवर बिहार का है.

मैंने मन में केवल उफ…भर किया…यह उफ भर ही काफी दर्द देने वाला है. मैंने सोचा क्‍या बेटी और वोट केवल अपनी जाति वाले को ही देना चाहिए या उस इंसान को जो अच्‍छा है…मुझे लगता है मेरा शीषर्क मेरा जवाब है.

जो वामपंथी हैं और जो नहीं हैं..

left partiesपिछले दस दिनों में भारतीय राजनीति में जो हुआ उस से मुझे कोई भारी ताज्जुब नहीं हुआ। संसद की लाज किसी ने अगर बचाई तो वह थे अकेले सोमनाथ दा ने। सोमनाथ दा को मेरा नमन। हमारे अच्छे कहलाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जरूर बेदाग प्रधानमंत्री हैं। इसमें किसी को कोई शक-सुबहा नहीं होगा। इसके बावजूद संप्रग के प्रधानमंत्री होने के कारण कई उंगलियां तो उन पर उठेंगी।

 विचारधारा की राजनीति करने वाली पार्टी वाम दलों ने दिखाया कि अब वह भी विचारधारा को ताक पर रख सकते हैं। वाम की विचारधारा में जातिगत राजनीति नहीं हैं। लेकिन..। मायावाती के साथ आगे आकर वाम दलों ने अपने विचारधारा की भी मिट्टी पलीद कर दी।

 विनाश काले..विपरीत बुद्धि..

शंकर सिंह वाघेला, नटवर सिंह जैसे कई बड़े नेता जो कभी भाजपा में होते हैं तो कभी कांग्रेस में तो कभी सपा, बसपा के साथ..। वाम दलों का कोई नुमाइंदा किसी दूसरी पार्टी के साथ नहीं जा मिलता लेकिन सोमनाथ को पार्टी से निकालने के बाद.. शायद ऐसे कई लोग भी होंगे जो अब लेफ्ट से राईट या सेंटर में जाना पसंद करेंगे।

सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक देश, भारत की राजनीति की एक पेंटिंग

indian politcs

एटमी डील सभी पार्टी चाहते हैं!!

nuclear deal

मैं मजाक नहीं कर रहा हूं। सच कह रहा हूं। आप भी मानेंगे कि एटमी डील के पक्ष में सभी पार्टियां हैं। मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा, समर्थन वापस लेने वाली लेफ्ट और कांग्रेस तो है ही। लेकिन थोड़ा बदलाव चाहती पार्टियां। क्या..?

कांग्रेस : अभी हो जाए एटमी डील सबसे बेहतर।
भाजपा : एटमी डील कांग्रेस के साथ ना होकर हमारे साथ हो तब बेहतर।
लेफ्ट : एटमी डील अमेरिका के साथ ना होकर चीन या रूस के साथ हो तो बेहतर।

यही सच है।

मेरी कविता और राजनीतिक चर्चा

indian politicsमेरा कम पसंदीदा विषय,
राजनीति
अजीब है स्थिति
लाल लाल हुए जा रहे हैं
भगवा को सही-गलत सूझ नहीं रहा
कांग्रेस मोहरों की गणित सीख रही

हर एक इंसान की किसी पार्टी का फालोअर होता है।
किसी को प्रधानमंत्री मेकर लालू पसंद है
किसी को भावी प्रधानमंत्री राहुल
किसी को एनाउंनस्ड प्रधानमंत्री आडवाणी
किसी को वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन
किसी को सुपर प्रधानमंत्री सोनिया
राजनीति में तथ्यपरक बातें कम
वस्तुपरक बातें ज्यादा होती हैं

आप पूरे घटनाक्रम पर नजर डालिए
शेक्सपियर का नाम में क्या रखा है
फेल हो रहा है,
लखनऊ हवाईअडडे का नाम बदल
चौधरी चरण सिंह हवाईअड्डा हो गया
अजीत सिंह, बसपा के करीब हो आए

दोस्तों अपने विचारधारा को टटोलिए
सोचिए, किस पार्टी के साथ हैं आप?
एटमी डील अच्छा है या नहीं?
कांग्रेस जो मोहरे इक्टठे कर रही है,
भाजपा जो ललचाई नजरों से ताक रही है,
लेफ्ट जिनके पास अमेरिका के अलावा और कुछ नहीं है
या उन नेताओं के साथ, जिनको जेल से बेल मिल रहा है..

किनके साथ हैं आप?

यह 22 तारीख तक का गुणा-भाग है
इसके बाद के समीकरण बाद ही बदलेंगे
चुनाव और चुनाव बाद की राजनीतिक चर्चा तो आप भी समझ जाएंगे

तो किसके साथ हैं आप?

भाजपा या वाम की सरकार होती तो क्या नहीं बढ़ते तेल के दाम?

भाजपा ने कहा, आर्थिक आतंकवाद है यह। माकपा ने अपने तीनों शासित राज्यों में हड़ताल कर दिया है। इस तेल की पाठशाला में क्या फेल हो गए मनमोहन?

राय बनाने से पहले कुछ खबर, जो जरूरी है-
भारत: तेल कीमतों में 10 फीसदी की वृद्धि।

मलेशिया: यहां पेट्रोल 1.92 रिंगेट है। (24 रुपये लीटर) सरकार को तेल की कीमते कम रखने केलिए 55 बीलियन रिंगेट (71400 करोड़ रुपये) की सब्सिडी देनी पड़ती है।

ताईवान: तेल की कीमतों में 13 फीसदी की वृद्धि।

श्रीलंका : 14 से 47 फीसदी तक बढ़ाए गए पेट्रोल और डीजल के दाम।

बांग्लादेश: 37 से 80 फीसदी तक दाम बढ़ाए जाने का प्रस्ताव।

एक महीने की यह गतिविधि कुछ तो समझा ही सकती है।

कच्चा तेल की कीमत में दो महीने में 25 फीसदी से ज्यादा की उछाल।
क्या इन सब को देखते हुए भी किसी को लगता है कि भाजपा या वाम की केंद्र में सरकार होती तो नजारा कुछ और होता.. राय देकर बता ही सकते हैं? क्या पता आपके पास आईडिया हो जो सरकार के पास ना हो…

भारतीय राजनीति को दिखाने वाले शब्द

सेज-सेतु, मंदिर-नंदीग्राम
तेल-खेल, धार-हड़ताल
चुनाव-वोट, भाजपा-कांगे्रस
वाम-धमकी, मान-मन्नौव्वल
नेता-गिरी, नेतागिरी
इस्तीफा-हल्ला, संसद-मछलीबाजार
मीडिया-रिपोर्ट, स्टूडियो-खद्दर
बयान-मुकरना, नीति-अनीति-राजनीति

ढेर सारे शब्द हैं! कुछ आप भी जोड़ दें..

लाल, भगवा और कलर लेस

विचारों में कितनी बड़ी फर्क है। अभी लाल हुए नहीं कि लोगों ने वाम कहना शुरू कर दिया। भगवा ओढ़ा तो संघ और भाजपा कहने लगे। बुर्जुआ लोगों का भी एक समाज है। अवसर को भुनाना इन्हें ही सबसे ज्यादा आता है।

मैं कलरलेस होना चाहता हूं। इन रंगों से जुदा। इसलिए कि जिंदगी में रंग भर सकूं।

कुछ स्टीरियोटाईप सोच: अंतिम भाग

पिछली पोस्ट में बेंगाणी जी ने कहा कि यह अपवाद हैं। उनके इस बात पर केवल इतना कहूंगा कि अपवाद उनके दिमाग में हैं। या अगर वह किस्मत को मानते हैं तो किस्मत के खोटे हैं, जिन्हें ऐसे लोग नहीं मिले। मैं किस्मत को नहीं मानता, कर्म को मानता हूं। मुझे ऐसे लोग मिले हैं।

खर, बात आगे बढ़ायी जाए।

चैत्र महीना में जेठ जैसी गर्मी पड़ रही थी। बाइक पर चलता हुआ मनोरंजन पूर्वी दिल्ली के विकास मार्ग पर 50 की स्पीड से गाड़ी चला रहा था। और तभी उसकी बाईक हुडुक हुडुक के साथ हिचकोले खाई। उसे पता चल गया पेट्रोल खत्म होने वाला है। मुश्किल से अब वह और एक किलोमीटर गाड़ी से जा सकता था। एक्सीलेरेटर पर उसका पंजा थोड़ा और तेज हुआ। लेकिन गाड़ी बंद हो गई थी। एक्सीलेरेटर ने आपना काम करना बंद कर दिया था। थोड़े देर बाद ही गाड़ी ने अपनी गति भी खो दी। मनोरंजन गाड़ी में बैठे हुए ही अपने पैर से धक्का दे गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था। तभी पीछे से एक वर्दीधारी ने बाइक में चलते हुए अपने बाएं पैर से मनोरंजन की बाइक को धक्का देना शुरू किया। उसने बिना कहे पेट्रोल पंप तक उसकी गाड़ी को धक्का दिया।

मनोरंजन को सहज यह एहसास नहीं हो रहा था कि एक पुलिस वाले ने ऐसा किया। कई बार सड़क पर अपनी गाड़ी को धक्का दे रहे लोगों के पास से तो मनोरंजन भी गुजरा था। लेकिन उसने यह जहमत कभी नहीं उठाई थी।

पुलिस भी अच्छा सोचते हैं और हमारी आपकी तरह खराब और अच्छे भी हो सकते है।

लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुघर्टना के बाद इसकी जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा सौंप दिया था। फिर एक और जमाना आया जब टाइम्स आफ इंडिया के आर के नारायणण ने एक काटरून में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री के बारे में काटरून बनाया। सुखराम अपने आफिस में बैठे हुए थे। चारों तरफ रुपये बिखरा हुआ था। अलमारी में, टेबल पर, फर्श पर, फाइलों के उपर-नीचे, हर जगह। सुखराम अपनी सीट में बैठे हुए कहते हैं, अरे कोई है जो मुझे एक सफेद प्लेन कागज दे, जिससे मैं यह बता सकूं कि मैं निदरेष हूं। झारखंड के रामगढ़ जिला के एक स्थानीय नेता ने एक लड़के को पढ़ाने का पूरा जिम्मा लिया हुआ है।

नेता ईमानदार भी होते हैं और भ्रष्ट भी।

महिलाएं बोलती हैं ठीक उसी तरीके से जैसे मर्द बोलते हैं ज्यादा।

मुझे किसी आजकल के लड़के ने कहा कि आजकल की लड़कियां मोबाइल पर बात ही करती रहती हैं। जब देखो मोबाइल। मैंने उससे कहा क्या बता सकते हो किससे बात करती हैं, उसने कहा लड़के से। मैंने कहा फिर तो आजकल के लड़के भी जब देखो मोबाइल पर ही बात करते रहते होंगे।

यह सब हमारे आपके कुछ स्टीरियोटाइप सोच हैं। इसी स्टीरियोटाईप से बाहर निकलिए। किसी पूर्वाग्रह में हो कर चीजों को मत देखिए।

इस राजनीतिक विचारधारा की क्या बात है!!

मैं भारतीय नागरिक हूं। दिल और दिमाग दोनों से। यहां की हर एक विचारधारा का सम्मान करता हूं। जहां अच्छाई होती है, खुल कर प्रशंसा करता हूं और जहां बुराई होती है, थोड़ा मुंह फेर लेता हूं या हल्क लहजे में उसकी बुराई कर देता हूं।

कांग्रेस, भाजपा और वामपंथियों तीनों की अपनी-अपनी विचारधारा है। इन तीनों के विचारों का मैं सम्मान करता हूं। लेकिन इनके कृत्यों पर अपना पक्ष भी रखता हूं। यह लोग विचारों की राजनीति नहीं करते हैं। यह कुर्सियों की राजनीति करते हैं।

84 के दंगों के बारे में कांग्रेसियों को बोलिये या फिर भगवा रंग वालों को गोधरा या बाबरी मस्जिद के बारे में, इनका रुख तीखा और थोड़ा आरोप देने वाला हो जाएगा। ठीक इसी प्रकार नंदीग्राम और कन्नूर की घटनाओं के बारे में जवाब देते हुए वामपंथियों को तकलीफ देती हैं।

अब आम इंसान को उसके विचारधाराओं की गलतियों की ओर इंगित करेंगे तो वह आप पर आग बबूला हो या तो गाली देना शुरू करेगा या फिर दूसरे विचारधारा वाले की गलती को बताना शुरू कर देगा। यह कुछ ऐसा है, मेरी कमीज तेरी कमीज से कम गंदी है।

इसका सबसे अच्छा सबूत हमेशा तथाकथित बुद्धिजीवी ही पेश करते हैं। चाहे वो हमारे सम्मानीय नेतागण हों या फिर ब्लागवीर लोग