लास्‍ट पोस्‍ट से आज तक

क्‍या इतना आसान ही होता है सबकुछ

या होती है इतनी ही उलझन

हरेक क्षण

कहीं मुस्‍कान, तो कहीं थरथराते होंठ

सागर भी देखे हैं उसने, और ऊंचाई पहाड़ की भी

तब शायद मतलब नहीं समझ पाया होगा इनका

इनके मायने भी हजार होते हैं…..

क्रिकेट खेल कर लौट रहे बच्‍चे, जाते लोगों से लिफ्ट मांगते

गाडि़यों और घरों से भरा शहर

भावनाएं बसती तो होंगी वहां

लोग जवाब में ‘शायद’ कहते हैं

इन सब  के बावजूद

फूल, सुबह, चांद, सूरज

हैं सब कुछ वैसे ही…… नैचुरल

जैसे लता और येशुदास का  गाया हुआ यह गीत

 मधुबन खूशबू देता है, सागर सावन देता है

जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है…..

क्‍या इतना आसान ही होता है सबकुछ

या होती है इतनी ही उलझन

हरेक क्षण????

परेशान इंसान हमेशा शरीफ होता है

dry tree

आज परेशान हूं
लिखूंगा एक कहानी
जो मेरी नहीं, उसकी नहीं
हर एक की होगी

परेशान इंसान हमेशा शरीफ होता है
कविताएं लिखता है
अपने क्षोभ की
दूसरे के लिजलिजेपन की

परेशान इंसान हमेशा शरीफ होता है
समुद्र-सूरज की बात
हवा से जिंदगी जीना
यही कविताओं के शब्द होते हैं

परेशान इंसान हमेशा शरीफ होता है
यादों की ऊपरी धूल झाड़
उस गरीब की खामोशी
और उसके फटे कपड़ों के बारे में लिखता है

परेशान इंसान हमेशा शरीफ होता है
खिंची हुई लकीरों और पूर्वाग्रह से आहत
राज की बिसात है
यहां कोई मात खाता है, कोई जीत जाता है

परेशान इंसान हमेशा शरीफ होता है
भूल जाता है, अपना लिजलिजापन
दिलाए याद नहीं आता
कि उसने भी कई गुनाह किए हैं

कई बार बदल देती है यह.. जिंदगी भी

frozen emotions

उस नमक को भी खरोंचा था
बड़ा मीठा सा स्वाद था
जो आज भी है तुम्हारे.. चेहरे पर

कितना खरचा था
और ना जाने कितना खरच होगा
तेरी याद में मेरे.. आंसू

सालती है
वह हंसी और खुशी
जब अब मिली.. जुदाई

कि अब हमने सीखा
मौसम बदलने का मतलब
कई बार बदल देती है यह.. जिंदगी भी

तन्हाई, जुदाई और गम

sorrow

क्या होती है..तन्हाई
शहर ने सिखाया
गांव में तो मैं अकेला रहा करता था

घर का आईना..जुदाई
बतलाता रहता है
पहले तो उसके आंखों में देखा करता था

रह-रह होता है..गम
खुद पर तरस नहीं
खुश होता हूं कि ना जाने आगे क्या होता

विज्ञान को कहां पता…

candlelight

पानी का कोई रंग नही होता
विज्ञान को कहां पता
खुशियां
..मन को भी रंग देता है

सांस लिए कोई जी नहीं सकता
विज्ञान को कहां पता
यादें
..कभी नहीं मरती हैं

आसमान की कोई सीमा नहीं
विज्ञान को कहां पता
विश्वास
..आंधी में भी दीपक जला देता है

विज्ञान से जीतना इतना आसान नहीं
जीत..इंसान की चेतना की है
क्योंकि
..विज्ञान झूठ नहीं बोलता

आह निकालते रहे!

waiting

चैन
अभी तो मिले भी नहीं
और जल्दी जाने की है

कश्मकश..
उन कोपलों में भी हैं
जो अभी खिले भी नहीं हैं

इंतजार
आने वाला पल, दूसरे पल का कर रहा
अश्क हैं कि बिना हिचक के बह रहा

आह
पूरा समंदर इसी से भरा
बावजूद यह उफान पर है

चैन मिला भी नहीं था..
कि कश्मकश में जा फंसे
इंतजार की शह और मात में
आह निकालते रहे

कुर्सी वाला, जोंक हो जाता है!

चोल, चेर और पाण्डय
मुगल भी आपस में लड़ पड़े
देशी क्या विदेशी भी

इतिहास की बात छोडि़ए
आजकल तो आफिस में भी
कुर्सी की भीषण लड़ाई हो रही…

आजकल सभी,
जोंक होने की चाहत रखते हैं
क्योंकि कुर्सी वाला, जोंक हो जाता है

किसकी और क्या है दिल्ली!

पिछले सात सालों से दिल्ली में रह रहा हूं, इसके साथ 27 साल की उम्र की समझ के साथ जो दिल्ली को देखा, सुना, पढ़ा, उसी मुतालिक कुछ पंक्तियां जोड़ने की कोशिश..

लुटियंस से लेकर केपी सिंह तक..
कितनों ने बनाया और कईयों ने लूटा..
दिल्ली ही घर है..

देश के अलग अलग हिस्सों से आए
उन 750 सांसदों की,
जिन्होंने देश को देने से ज्यादा इससे लिया है

सुप्रीम कोर्ट में हक के लिए लड़ने आए
देश के कई लोगों की भी..
जो लूटे होते हैं और देश का कानून उन्हें और लूट लेता है

थोड़ा व्याकुल, थोड़ा उत्साहित
रोजगार के लिए गांव से आने वाले उस युवक की भी
जो अभी ट्रेन में बैठा भी नहीं है

चौड़े सड़क पर झूम कर चलने वाले
उन नौजवानों की भी
जो वीकेएंड में अखबार का हिस्सा बन जाते हैं

कुकुरमुत्ते की तरह खुले पत्रकारिता में पढ़ने वाले
युवा पत्रकार से लेकर वरिष्ठ पत्रकारों की भी
जो सीवी, फोन और मुलाकात का सिलसिला नहीं छोड़ते

ब्लू लाईन, व्हाइट लाइन, मुद्रिका और बाहरी मुद्रिका
आफिस से परेशान उन लाखों यात्री की भी
जो जवानी का आधा हिस्सा बस में गुजार देते हैं

नार्थ कैम्पस, साउथ कैम्पस और मुखर्जी नगर
पढ़ने आए उन छात्रों की भी
जिनके हाथों में फरवरी में सुर्ख लाल गुलाब नजर आते हैं

एम्स, अपोलो और सफदरजंग आने वाले
बीमार और उन तीमारदारों की भी
जिन्हें खुशियां तो, कभी गम ज्यादा मिलते हैं

बाकि बचे हम साधारण लोग

काम से छूटे
किराए घर में आए
कुंवारा खाने की, विवाहित अन्य परेशानियों में
लग जाता है..
रात को देर से सोना
..फैशन मान लिया जाता है।
कंम्प्यूटर और लैपटाप में खिटिर फिटिर के बाद
पांच बाई साढ़े छ: के बिस्तर में
..आठ बजे जल्दी उठ जाते हैं।
कई रिपोर्ट और कई लेखनी
दिलवालों से लेकर, संवेदनाओं से मरा हुआ
र्ईट और गारे से भरा हुआ
शहर बता चुके हैं।
लोगों कहते हैं..
दिल्ली का मौसम, अपना नहीं है
राजस्थान इसे गर्मी और हिमाचल सर्दी दे जाता है

नेताओं ने इस बात को सुनकर
पूरी दिल्ली को ही शंघाई बनाने का फैसला किया
करोड़ों खर्च किए
सफर, आस्था और जज्बा बढ़ाने वाले
मेट्रो, मंदिर और खेल गांव बनवाए

दिल्ली का दिल धड़कता है-

नेता, आरोपी बेरोजगार और नौजवानों में
पिछे नहीं हैं छात्र, पत्रकार और बीमार

इंडिया गेट, लाल किला, कुतुब मीनार
जनपथ, मोनेस्ट्री और पालिका बाजार
यही है यहां की पहचान
इसी से बढ़ती है दिल्ली की शान

This is Going to Hurt Just a Little Bit

दसवी में पढ़ी एक Poem से मुलाकात हुई. कवि Ogden Nash दांत के डाक्टर के पास जाने में डर रहा है और वो यह कविता लिखता है. पढिये मजा आएगा

One thing I like less than most things is sitting in a dentist chair with my mouth wide open.

And that I will never have to do it again is a hope that I am against hope hopan.

Because some tortures are physical and some are mental,

But the one that is both is dental.

It is hard to be self possessed

With your jaw digging into your chest,

so hard to retain calm

When your fingernails are making serious alterations in your life line or love line or some other important line in your palm,

So hard to give your ususal cheerful effect of benignity

When you know your position is one of the two or three in life most lacking in dignity

And your mouth is like a section of road that is being worked on

And it is cluttered up with stone crushers and concrete mixers and drills and steam rollers and there isn’t a nerve on your head that aren’t being irked on.

Oh some people are unfortunate to be worked on by thumbs,

And others have things done to their gums,

And your teeth are supposed to being polished

But you have reason to believe they are being demolished.

And the circumstances that adds to your terror

Is that it’s all done with a mirror,

Because the dentist may be a bear, or as the Romans used to say, only they were referring to a feminine bear when they said it, an ursa,

But all the same how can you be sure when he takes his crowbar in one hand and mirror in the other he won’t get mixed up, the way you do when try to tie a bow tie with the aid of a mirror, and forget that left is right and vice versa

And then at last he says, That will be all, but it isn’t because he then coats your mouth from cellar to roof

With something I suspect is generally used to put shine a horse’s hoof,

And you totter to your feet and think, Well it’s over now and after all it was only this once,

And he says come back in three monce.

And this O Fate, is I think the most vicious that thou ever sentest,

That Man has to go continually to the dentist to keep his teeth in good condition

When the chief reason he wants his teeth to be in good condition is so that he won’t have to go the dentist.

By- Ogden Nash

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