अंग्रेजी की तल्‍खी और हिंदी की बेचारगी

इस शीर्षक को समझने के लिए हिंदी और अंग्रेजी के पत्रकारों से बात किजिए…बात थोड़ी बहुत समझ में आ जाएगी…ऐसा कम हुआ है कि रिपोर्ट हिंदी में लिखी या बनाई गई हो और उसका अनुवाद या प्रोडक्‍शन अंग्रेजी वालों को करना पड़ा हो. एमजे अकबर जब संडे आब्‍जर्वर के संपादक थे तब वह एसपी सिंह के नेतृत्‍व में निकलने वाली रविवार के कुछ रिपोर्ट को अंग्रेजी में अनुवाद कराकर निकालते थे…

आज सुबह ऐसा ही कुछ वाक्‍या मैंने देखा…मैंने एक रिपोर्ट फाईल की जो हमारे इनहाउस के बारे में थी…मैंने वह रिपोर्ट अंग्रेजी वालों को इसलिए बता दी कि इनहाउस का मामला है वह भी देख लें….मुझसे कहा गया कि मैं उस हिंदी का अंग्रेजी अनुवाद करके दे दूं….

मैं समझ नहीं पाया कि मैं दे दूं….क्‍यों….मैंने साफ-साफ कहा कि जब हम अनुवाद करते हैं तो क्‍या कभी कहा कि आप हमें ट्रांसलेट करके दे दीजिए….

मैंने उसका अनुवाद नहीं किया…लेकिन वह तल्‍ख रवैया तो जरूर देखा….

 यह है अंग्रेजी की तल्‍खी….

..फोटोग्राफर चल दिए इंडिया गेट

दिल्ली में बारिश हुई। अखबार और चैनल से जुडे़ फोटोग्राफर और कैमरामैन चल दिए इंडिया गेट..। मानो पूरा दिल्ली वहीं जुटा हुआ हो। कैमरा रोल हुआ.. आंखे कुछ खास नहीं ढूंढती। उन्हें कुछ सुंदर चेहरों की तलाश होती है। कुछ साल पहले तक केवल लड़कियों के ही चित्र छपते थे। अब थोड़ा जमाना बदल गया है। अगर फोटो किसी जोड़े की हो तो क्या कहने! couple in monsoon

दिल्ली में यह मिल भी जाता है। यहां फोटोग्राफरों को दिक्कत नहीं होती। बाकी खबरों की तरह यहां नहीं कहना पड़ता, थोड़ा हाथ पकडि़ए, ऐसे नहीं.. आप थोड़ा पीछे..। यह सब यहां नहीं चलता। एकदम नैचुरल क्लिक होती है। और कैमरे में कैद हो जाते हैं जोड़े। दिल्ली में रहने वाले किसी अखबार के आज का पहला और दूसरा पन्ना देख सकते हैं। इस बारिश में जो कौमन होता है वह इंडिया गेट और लड़कियां..।

फोटो साभार: हिन्दुस्तान टाइम्स

लोकतंत्र पर नही डंडे पर भरोसा

पता नही हम अच्छा क्यों नही देख पाते. कुछ भी बुरा हुआ उसके पीछे लग जाते हैं. हर जगह कुछ ना कुछ अच्छा होता है लेकिन टीवी हो या अखबार बताई जाती हैं बुरी खबर जायदा. (अच्छी भी बताई जाती हैं, लेकिन कम) इसमे भी हिंदू उग्र संगठन टू बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं.  NDTV  का नया चैनल आ रहा है २१ जनवरी से रामायण दिखाया जाएगा. ये उन हिंदू संगठनो को नही दिखा. क्या दिखा? दिखा ये की भारत रत्ना के पोल में ऍम अफ हुसैन का नाम क्यों हैं? भाई ये एक निजी चैनल है वो क्या दिखायेंगे वो आप नही उनके समाचार सम्प्दक का निर्णय होगा. हिसार में ईश्वर सिंह को भारत रत्ना देने की मांग की गई है. आप जानते हैं कौन हैं ईश्वर सिंह? 10 में से 1 को पता होगा. मैं बता देता हू, ईश्वर सिंह हरियाणा विधानसभा के स्पीकर हुआ करते थे. किसी भी बात में बात हम हिंदू संगठन इतने उग्र क्यों हो जाते हैं. राम की तो बात करते हैं लेकिन सौम्यता तो छु भी नही पाई है हमलोगों को. क्या सिखायेंगे और सिखने की तो छोड़ ही दीजिये.

मोदी का पानी मांगना..क्या संकेत देता है?

पोस्ट लिखते हुए पहले हेडिंग देने की इच्छा हो रही थी मोदी का आखिरी इंटरव्यू। लेकिन लिखा नहीं..! कारण सीधा सा, मैं भविष्य नहीं देख सकता।

आज सीएनएन आईबीएन के मशहूर प्रोग्राम डेविल्स एडवोकेट में मोदी इंटरव्यू के बीच से माइक निकाल कर चले गए। उससे पहले पानी मांगा, पिया और..।

अनिल कपूर की फिल्म नायक में भी ऐसा ही कुछ एक सीन है। अनिल कपूर सवाल पूछता जाता है और मुख्यमंत्री बने अमीरश पुरी इसका जवाब देते जाते हैं लेकिन पुरी भी एक बार फंस जाते हैं और ऐसे ही बीच इंटरव्यू छोड़ कर जाना चाहते हैं। अनिल कपूर ने तो पुरी को रोक लिया था लेकिन करण थापर वाक पटु नरेंद्र मोदी को रोक नहीं पाए।

खैर जो थापर ने सवाल किया था उसे आप यहां पढ़ सकते हैं। और उसके फुटेज आपको यहां मिलेंगे।

मैं नहीं जानता कि नरेंद्र मोदी इस बार जीत पाएंगे या मेरा नहीं लिखा जाने वाला हेडिंग सही हो जाएगा। जो भी होगा अगर मेरी बात सही हुई तो मोदी अपना उन सारे बाबाओं से अपना राशिफल दिखवा लें, मुमकिन है उनका खराब दौर शुरू हो जाएगा। मुमकिन है शुरुआती दिनों में वह भी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ लेंगे।

और अगर वह नहीं भी हारते हैं तो यह राजनीति है यहां कोई अजेय नहीं है। कभी तो हारेंगे.. और जिस दिन भी हारेंगे वहीं से खराब दिन शुरू हो जाएगा।

मुझे लोकतंत्र पर पूरा भरोसा है अगर मोदी की जीत होती है तो मोदी सच में बहुमत गुजरातियों के लिए अच्छे होंगे लेकिन नहीं.. तो फिर आप राजनीति का बदला और कानून का कसाव देख पाएंगे।

बदलता भारत: टाइम्स आफ इंडिया की तीन खबरें

हमारा भारत विकास कर रहा है। इसको मापने का मीटर सेंसेक्स। जो आज 16000 के पार चला गया। कल यह खबर बिजनेस पेज से निकलकर पहले पन्ने पर आ जाएगी। और रनडाउन में इसकी जगह पहले खबर के रूप में ली जाएगी।

लेकिन आज टाइम्स आफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में तीन खबरें इस विकास कर रहे भारत के समाज पर धक्का लगाती है।

पहला, देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई के लोन रिकवरी एजेंटों ने मुंबई के एक आदमी को इतना परेशान और धमकाया कि वह आत्महत्या करने को मजबूर हो गया। महज 50000 रुपये के लिए।

दूसरा, दिल्ली हाई कोर्ट ने एक लड़के और उसकी पत्नी को अपने बूढ़े माता-पिता को धमकाने के जुर्म में समन जारी किया है।

तीसरा, उड़ीसा की महिला आयोग ने माना है कि राज्य में महिलाएं पुरुषों को प्रताड़ित कर रही हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक 38 ऐसे मामले रजिस्टर किए गए हैं।

भारत तेजी से बदल रहा है। विकास की बयार चारों ओर बह रही है। लेकिन इसकी हवा में कुछ तो ऐसा घुल जो हमारे समाज को थोड़ा अस्वस्थ कर जाता है।

काम का दवाब और विकास की होड़ में अच्छे-बुरे को भुलते जा रहे हैं। ग्लोबलाईजेशन में हम अपने दिमाग पर काबू नहीं कर पा रहे हैं। पैसा हमारी सबसे बड़ी जरूरत के रूप में उभर कर आ रहा है। चाहे इसके लिए किसी को कुछ भी करना पड़े।

मीडिया का उदाहरण देकर समझा सकता हूं। अखबार अश्लील तस्वीरों के जरिए अपना सकरुलेशन बढ़ाना चाहता है। टीवी दुष्कर्म के सीन दिखाकर। और इंटरनेट में संता बंता को का होम पेज यह बताने के लिए काफी है कि हम क्या परोस रहे हैं। पैसा..पैसा..और पैसा।

पैसा जरूर कमाइए लेकिन पहले मन की शांति जरूरी है।

दूरदर्शन की 48वीं सालगिरह और बहस का वहीं पुराना मुद्दा

ईमानदारी से बोलूं तो दूरदर्शन तो मैं कम ही देखता हूं। ईद के चांद की तरह। देख लिया तो देख लिया नहीं तो कोई बात नहीं। लेकिन दूरदर्शन है ईद का चांद ही। पाक भी और साफ भी। इसे अपना दायित्व पता है और उसी के माफिक यह चलता है। कल रात दूरदर्शन की 48वीं सालगिरह के मौके पर एक बहस का आयोजन किया गया। विषय था- भारतीय टीवी चैनलों का दायित्व।

इस पर प्रभु चावला इंडिया टुडे समूह (इसी का ‘आज तक’ भी है)के मुखिया कहते हैं कि हमारा काम बदलते भारत को दिखाना है। हम कौन होते हैं जिम्मेदारी वहन करने वाले?

मैं नहीं समझता यह जिम्मेदारी भरा वक्तव्य है। आप लोकतंत्र के चौथा खंभा होने को तैयार हैं लेकिन दायित्व निभाने के लिए तैयार नहीं हैं। अतार्किक बातें।

राजदीप सरदेसाई कहते हैं कि हमारे रिपोर्टर अच्छे हैं लेकिन हम संपादक लोग खराब हो गए हैं!! क्यों हो गए हैं आप खराब? आप तो सुधरिए। कथनी को करनी में भी लाइए।

बहस में जो दर्शकगण बैठे थे वो दर्शक नहीं किसी न किसी संस्थान से जुड़े पत्रकार ही थे।

नंबर वन बनने की ऐसी दौड़ लगी है कि पता ही नहीं चल रहा कि हम अपने कपड़े भी गंदे कर रहे हैं। बहस का संचालन कर रहे आलोक मेहता इसके लिए ‘भेड़ चाल’ शब्द का प्रयोग करते हैं।

शक्तिमान फेम मुकेश खन्ना कहते हैं कि हर चैनल यह बताता फिरता है कि घटना कि पहली तस्वीर हमारे पास है। क्यों बता रहें हैं, जब आप ही के पास है तो लोग तो वैसे भी जान जाएंगे।

‘आंखों देखी’ वाली नलिनी सिंह कहती है कि पटियाला में जब कैमरामैन और रिपोर्टर आत्महत्या करने वाले व्यापारी को बताते हैं कि आग ऐसे लगाओ, अभी नहीं..। वह पत्रकार को भारत का जिम्मेदार नागरिक बनने को कहती हैं। यह बहस तो चलती रहेगी कि पत्रकार क्या करे, अपना काम या फिर लोगों को पुलिस को इन सब कार्यो को करने से रोके।

रामानंद सागर (रामायण के निर्माता-निर्देशक) के छोटे भाई कहते हैं कि हमने बिना टीआरपी को सोचे हुए रामायण बनाई, जिसे सब लोगों ने पसंद किया।

एनडीटीवी के पंकज पचौरी कहते हैं कि हम मिलजुल कर समिति बनाएंगे जो यह देखने का काम करेगा कि कुछ गलत तो नहीं हो रहा है।

लेकिन कब..।

इस बहस में जो बात मुझे समझ में आई कि यह एक प्रोग्राम बना जिसे दिखाया गया। इसका कोई खास असर हमें नहीं दिखेगा। हम पैसे की अंधी दौड़ के लिए दौड़ रहे हैं जिसकी लालसा बमुश्किल रुक पाएगी।

मेरे घर के चारों खंभे हिलते हैं!!

मैं जिस घर में पैदा हुआ वही मेरा घर हो गया। मेरा घर मुझे बहुत प्यारा लगता है। यह सबके साथ होता है। इसमें नया कुछ भी नहीं है।

इसके आसपास खूब विकास हो रहा है। मेरे घर में भी विकास हो रहा है। अब मेरा घर सुबह-शाम चमकता रहता है। वैसे तो यह घर बहुत पुराना है। काफी पुराना लेकिन मेरे ‘बापू’ को यह 60 साल पहले मिला था। सो मैं या बाहर के लोग भी इसे 60 साल पुराना ही मानते हैं।

इधर मेरे घर में काफी शोर हो रहा है। मैं थोड़ा परेशान हूं और हो जाता हूं। अपने घर वाले ही घर के अंदर ही शोर मचा रहे हैं। मेरे भाई, मेरी बहन। लेकिन फिर भी ‘बापू’ के संस्कारों से घर सही से चल रहा है।

तो मैं कह रहा था कि मेरे घर के चारो खंभे कभी-कभी हिलते हैं। पता नहीं क्यों? वैसे तो मुझे लगता रहता है कि घर की बनावट में सब कुछ ठीक है लेकिन फिर भी कभी-कभी..।

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथा प्रेस(यह कभी सबसे मजबूत तो कभी सबसे कमजोर खंभा नजर आता है।)

Indian Parliament

न्यायपालिका रूपी खंभे पर तब थोड़ी कंपन हुई जब कोई आदेश देता है कि गीता को धर्मशास्त्र का दर्जा मिलना चाहिए। मेरे घर का यह सबसे मजबूत खंभा है। अगर इसमें कंपन होती है तो घर में दरकने का खतरा हमेशा बना रहेगा।

विधायिका रूपी खंभा तो कई बार हिला है। तहलका का खुलासा हो, सांसदों के प्रश्न के बदले पैसे मांगने का मामला। जिसे सबसे ज्यादा मजबूत होना चाहिए, वही सबसे ज्यादा कमजोर है। मेरे घर का सबसे ज्यादा बोझ इसे ही वहन करना है।

कार्यपालिका रूपी खंभा को हिलाने के लिए दो-तीन शब्द कहना चाहूंगा। बोफोर्स, झामुमो रिश्वत कांड। इसका काम करने का तरीका थोड़ा ढंका हुआ होता है। हां! आरटीआई के आने से यह जरूर साफ हुआ है।

और अंत में

प्रेस। इसके पास एक कलम है। और आजकल यह कहता फिरता है, पेन इज माइटर दैन शोर्ड। यह दंभी हो रहा है। मेरे पास पावर है। मुझे यह करने की छूट है। मैं यह कर सकता हूं। यह अपना दायित्व भूलता जा रहा है। कैमरे के जरिए अब यह काले काम कर रहा है। अगर यह सशक्त रहा तो मेरा घर हमेशा आबाद रहेगा। इसे अपने दायित्वों को समझना होगा।

मेरे घर के चारो खंभे एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हें मिलकर काम करना होगा। तभी हमारा भारत महान हो पाएगा।

इससे बड़ा (कु)तर्क हो नहीं सकता

जनता: आप लोग अपने चैनल पर यह भूत-प्रेत, सांप-नेवला, नरकलोक-स्वर्गलोक क्यों दिखाते हैं?

संपादक: आप जनता देखते हैं इसलिए हम दिखाते हैं।

यह कुतर्क है। मेरा मानना है। ऐसे लोग जो इसे तर्क मानते हैं वह बिना कु के ही पढ़े।

जागरण डॉट काम हुआ अब याहू जागरण डॉट काम

यह बताता है कि हिंदी का बाजार बढ़ रहा है। दैनिक जागरण ने बाजार को बताया कि हिंदी भी अपना बाजार कायम कर सकता है। पहले अखबार के जरिए। दैनिक जागरण विश्व का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला अखबार है। और अब इंटरनेट के जरिए। हिंदी का पाठक जागरण डाट काम से वाकिफ है। अब यह दैनिक जागरण और याहू दोनों के संयुक्त प्रयास से चलेगा।

याहू का किसी हिंदी न्यूज पोर्टल के साथ गठजोड़ यह बताने के लिए काफी है कि हिंदी का बाजार कितनी तेजी से बढ़ रहा है। दैनिक जागरण का उदय 1997 में हुआ था। अपने निर्माण के दस साल बाद इसने जो मुकाम हासिल किया है, उसे छू पाना इसके प्रतियोगियों के लिए काफी मुश्किल है।

फिलहाल इसका बीटा वर्जन लांच किया गया है। साथ ही इसका पुराना वर्जन भी चल रहा है, जो धीरे-धीरे हट जाएगा। तो हम अब हम अपने जागरण को अब नए रूप में देख सकते हैं।

जागरण-याहू बीटा वर्जन

‘मेरा भारत परेशान’ से ‘मेरा भारत महान’ तक

भारत के आम नागरिकों की राय है यह। कोई भारत से परेशान है तो कोई भारत को महान कहता है। आम भारतीय वर्तमान में जीता है। इन्हें भूत और भविष्य से कोई मतलब नहीं। हड़ताल में यह परेशान होता है। और ज्यादा मजदूरी मिलने पर खुश हो जाता है।

आज का भारत 60 साल का नौजवान भारत है। इसकी रफ्तार से हर कोई अचंभित है। देशी विदेशी सभी इसके तारीफ कर रहे हैं। अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर भारत से ज्यादा उत्सुक है।

टाइम ने अपने वर्तमान अंक में भारत की तारीफ की है। आजादी के 60 साल पूरे होने पर टाइम ने भारत पर विशेषांक प्रकाशित किया है। टाइम से पहले कई और विदेशी अखबारों और चैनलों ने भारत की ओर नजरें इनायत की हैं (इसे देख लें)

मेगास्थनीज, इब्नबतूता, फाहियान, ह्वेन स्वांग ने भारत की तारीफ में कसीदे पढ़े हैं। सभी भारत की ओर ही ताक रहें हैं। विकिपिडिया पर किसी देश के पेज को पढ़ने में अमेरिका के बाद भारत के पेज का नंबर है। भारत और भारत की चीजें आज विश्व भर में लोकप्रिय हो रहीं हैं। लंदन में पनीर टिक्का की बिक्री बर्गर के करीब-करीब है। विदेशी महिलाओं को साड़ी में काफी पसंद है।

आज से बीस साल पहले टाटा और बिड़ला भारत में भारत के सबसे बड़े ब्रांड एंबेस्डर थे। टाटा-बिड़ला सभी के जुबान पर थे। यही हाल आज पूरे विश्व का है। आईटी, स्टील, फिल्म और साहित्य में भारत का परचम अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और खाड़ी देशों पर लहरा रहा है।

कोरस को खरीदने की भारी भरकम डील की खबर हो या अरुंधति राय व अनिता देसाई को बुकर पुरस्कार मिलने की खबर। हम आगे बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे। सपेरों के देश से अमीरों के देश बनने की कहानी भी दुनिया वाले आंखें फाड़-फाड़ कर देख और पढ़ रहे हैं। विदेशियों की रुचि पौराणिक योग में भी बढ़ी है।

क्रमश: