अगर चित्र कुछ बोलती है तो यह भी कुछ बोल रही है की जमाना बदल गया है

IPC section 489Aयह चित्र किस बारे में है यह समझ गए होंगे जो नही समझ पा रहे हैं वो माउस को फोटो के ऊपर ले जाए फोटो का जिस नाम से सेव किया गया है या एड्रेस बार में इसको देखे. इसके बारे में जानने की कोशिश करे. बड़ा भयावह है यह कानून जब इसका ग़लत उपयोग होता है.

यह चित्र पूर्वी दिल्ली के यमुना पुल को पार करने के बाद शकरपुर की पुलिस चौकी के सामने से लिया गया.

झूठ बोलतीं हैं महिलाएं..

हां, यही सच है, अधिकांश महिलाएं झूठ ही बोलती हैं। साथ में शराब भी पीती हैं, कपड़े भी भड़काऊ पहनती हैं और झूठ भी बोलती हैं।

यही कहा जा रहा है ब्रिटेन में। एक रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार के 100 मामले में केवल 5 मामले में आरोपी दोषी साबित हो पाता है। इसकेउलट महिलाओं पर इल्जाम लगता है कि वह बलात्कार को लेकर झूठ बोलती हैं।

यह वही ब्रिटेन है, जहां के कानून पूरे विश्व के कानून को एक दिशा देता है। वकील और जज वहां के केस की स्टडी करते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में हर साल बलात्कार के 14000 मामले सामने आते हैं, जिसमें से हर 20 में से 19 आरोपी रिहा हो जाते हैं।

इसके पीछे कैसी-कैसी दलील दी जाती हैं, जरा गौर फरमाएं:
बलात्कार का कोई चश्मदीद नहीं होता है।
किसी भी क्लोज शर्किट कैमरे में कोई तस्वीर नहीं मिलती।
लड़की खुद नशे में होती है।

यह कोर्ट में कही जाती हैं, जो बाहर कही जाती हैं, कुछ स्टीरियोटाईप ही है

लड़की ने भड़काऊ कपड़े पहने हुए थे।
लड़की ने उत्तेजित किया था।
उसपर से यह बात कही जाती है कि बढ़ते हुए बलात्कार के केस को देखते हुए छेड़छाड़ और ऐसी ही घटनाओं पर पुलिस ज्यादा तवज्जो नहीं देती।

नोट: मैने जो कुछ भी लिखा है, वह न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट और वाल स्टीर्ट जर्नल पर लिखे गए एक ब्लाग को पढ़कर लिखा है।

आप इसे देख कर हस पड़ेंगे

Copies of decision

फोटो देख लिया. हसी नही आई. अब जरा नीचे का कैप्शन पढ़ ले. याकूब मेनन के घर में कितनी कॉपिया गई होंगी. यह सोचकर तो मुझे और हसी आ रही है. इसे कोर्ट से घर ले जाने का किराया कोर्ट देगी या ये ख़ुद ही ले जायेंगे. कम से कम एक ऑटो तो बुक करना पड़ेगा. मजेदार :) 

फोटो साभार: इंडियन एक्सप्रेस

तो अमिताभ बताएं कैसे उत्तर प्रदेश में है जुर्म कम!!?

Amitabh Bachchan

देश की दशा और दिशा बदलने के लिए भारत में दो कानून बने। और सच में दोनों कानून कुछ हद तक अपना काम कर रही हैं। पहला है राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना। दूसरा है सूचना का अधिकार।

दोनों कानून का प्रभाव भरपूर है। एक गरीबों के उत्थान के लिए है, जिसका फर्क तो दिख रहा है लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए। लेकिन मुझे विश्वास है कि एक दिन इसका असर ताजमहल की चमक की तरह ही दिखेगा। दूसरे कानून का मैं एक क्रांतिकारी कानून की तरह देखता हूं। इससे सभी सरकारी महकमा त्रस्त है। सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री कार्यालय और यूपीएससी ने अर्जी देकर कहा है कि हमें सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत ना लाया जाए। यह है इसका प्रभाव। अच्छी बात यह है कि इसे माना नहीं गया है।

खैर मैं बात कर रहा था सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की, जो क्रिकेट मैचों के ब्रेक के दौरान ठंडा तेल, चाय तो कभी जोड़ों के दर्द का बाम बेचते नजर आते हैं। यही अमिताभ बच्चन सात-आठ महीनों पहले टीवी पर यूपी है दम क्योंकि जुर्म है यहां कम.. कहते नजर आते थे।

भारत का कोई नागरिक सूचना के अधिकार के कानून के तहत यह जानना चाहता है कि..
अमिताभ किस आधार पर यह बात कहते थे?
वह केंद्रीय रिपोर्ट कब की बनी हुई है?
उसमें कौन-कौन से राज्य शामिल हैं?
जुर्म का आधार कब से कब तक का लिया गया है?
और..
इस प्रसारण के लिए अमिताभ को कितना पारिश्रमिक मिला था?

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सब अमिताभ से तत्कालीन उत्तर प्रदेश विकास परिषद के सदस्य होने के नाते पूछा गया है। जवाब 15 अक्टूबर को देना है।

मेरे घर के चारों खंभे हिलते हैं!!

मैं जिस घर में पैदा हुआ वही मेरा घर हो गया। मेरा घर मुझे बहुत प्यारा लगता है। यह सबके साथ होता है। इसमें नया कुछ भी नहीं है।

इसके आसपास खूब विकास हो रहा है। मेरे घर में भी विकास हो रहा है। अब मेरा घर सुबह-शाम चमकता रहता है। वैसे तो यह घर बहुत पुराना है। काफी पुराना लेकिन मेरे ‘बापू’ को यह 60 साल पहले मिला था। सो मैं या बाहर के लोग भी इसे 60 साल पुराना ही मानते हैं।

इधर मेरे घर में काफी शोर हो रहा है। मैं थोड़ा परेशान हूं और हो जाता हूं। अपने घर वाले ही घर के अंदर ही शोर मचा रहे हैं। मेरे भाई, मेरी बहन। लेकिन फिर भी ‘बापू’ के संस्कारों से घर सही से चल रहा है।

तो मैं कह रहा था कि मेरे घर के चारो खंभे कभी-कभी हिलते हैं। पता नहीं क्यों? वैसे तो मुझे लगता रहता है कि घर की बनावट में सब कुछ ठीक है लेकिन फिर भी कभी-कभी..।

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथा प्रेस(यह कभी सबसे मजबूत तो कभी सबसे कमजोर खंभा नजर आता है।)

Indian Parliament

न्यायपालिका रूपी खंभे पर तब थोड़ी कंपन हुई जब कोई आदेश देता है कि गीता को धर्मशास्त्र का दर्जा मिलना चाहिए। मेरे घर का यह सबसे मजबूत खंभा है। अगर इसमें कंपन होती है तो घर में दरकने का खतरा हमेशा बना रहेगा।

विधायिका रूपी खंभा तो कई बार हिला है। तहलका का खुलासा हो, सांसदों के प्रश्न के बदले पैसे मांगने का मामला। जिसे सबसे ज्यादा मजबूत होना चाहिए, वही सबसे ज्यादा कमजोर है। मेरे घर का सबसे ज्यादा बोझ इसे ही वहन करना है।

कार्यपालिका रूपी खंभा को हिलाने के लिए दो-तीन शब्द कहना चाहूंगा। बोफोर्स, झामुमो रिश्वत कांड। इसका काम करने का तरीका थोड़ा ढंका हुआ होता है। हां! आरटीआई के आने से यह जरूर साफ हुआ है।

और अंत में

प्रेस। इसके पास एक कलम है। और आजकल यह कहता फिरता है, पेन इज माइटर दैन शोर्ड। यह दंभी हो रहा है। मेरे पास पावर है। मुझे यह करने की छूट है। मैं यह कर सकता हूं। यह अपना दायित्व भूलता जा रहा है। कैमरे के जरिए अब यह काले काम कर रहा है। अगर यह सशक्त रहा तो मेरा घर हमेशा आबाद रहेगा। इसे अपने दायित्वों को समझना होगा।

मेरे घर के चारो खंभे एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हें मिलकर काम करना होगा। तभी हमारा भारत महान हो पाएगा।

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