घर की याद और कुछ बातें झारखंड की

घर से लौट कर आया हूं। जेठ की दुपहरी की तरह हैं अभी घर की यादें। एक दम कड़क। ताजा-ताजा। घर से चलते वक्त का अंतिम खाना.. कौर ठीक से अंदर नहीं जाता। आज भी.. और तब भी होता था जब घर से पहली बार निकला था।

एक जुलाई की रात झारखंड एक्सप्रेस से जा रहा था, दो को घर पहुंचना था लेकिन दो जुलाई को झारखंड बंद, तीन जुलाई को भारत बंद। पहले ट्रेन का रूट बदला और फिर बारिश और बंद ने सुहाने सफर को आह-आउच सा बना दिया।

तीन अहले सुबह किसी तरीके घर पहुंचा। लेकिन घर पहुंचने के बाद किसी तरीके से आह-आउच वाली स्थिति वाह-वाह हो गई। मेरी छह महीने की भतीजी का हंसता हुआ चेहरा जो दिखा। भतीजी का नाम उसकी बुआ ने माही रखा है। पूरा घर माही-माही से गुंजायमान रहता है।
इसी बीच मुझे लग रहा था मैं कुछ मिस कर रहा हूं, सोच रहा था आलोक पुराणिक ने आज संडे स्पेशल यू हीं कुछ लिखा होगा.. अपने डाक्टर साहब(अनुराग जी) ने भी अपने यादों के पेड़ को झकझोरा होगा, कुछ पत्ते सहज रूप से गिरे होंगे। पुराने लेकिन ताजा-ताजा से लगने वाले।
प्रमोद सिंह अजदक वाले ने कुछ आलापा होगा, जिसे मैं एक बार पढ़ता हूं फिर दूसरी बार पढ़ने पर समझ पाता हूं। तब पता चलता है कि कितनी बड़ी बात लिखी गई है। ठीक ऐसे ही ना जाने कितनों के बारे में सोचा और अपने दोस्तो को बताया..।

इन सब पलों में मेरा कैमरा मेरे साथ था। फोटो लिए, फ्लिकर पर अपलोड किया। मेरे पत्रकार दोस्त ने इसे देखकर कहा, मैंने ऐसी हरियाली तो कहीं देखी ही नहीं है। मैंने कहा झारखंड के नाम में हरियाली है। झार=झाड़=झाडि़यां, पेड़-पौधे.. rajeshroshan

झारखंड के बनने से बहुत कुछ बदल गया है। बहुत कुछ..। इस अमीर राज्य के गरीब जनता के साथ कितना अच्छा हो रहा है कितना बुरा..यह एक अलग बहस का हिस्सा है।

मेरे लिए तो मेरा झारखंड जैसा भी अच्छा है। कई बुराईयां जिसे मिटाना होगा। झारखंड बंद झारखंड का सबसे सफल हथियार सा नजर आता है। इसे बदलना होगा। कब और कैसे इसका मुझे ज्ञान नहीं लेकिन इतना पता है कि इस अमीर राज्य के लोगों को दिल से, मन से और जेब से अमीर बनना है तो झारखंड बंद को बंद करना होगा।

मुंह दिखाई 5 रुपए!!!

नई नई दुल्हन, सारे अड़ोस पड़ोस की महिलाये दुल्हन को देखने आई. दुल्हन ने भी घूंघट डाल रखा था. परम्परा जो सालो से चली आ रही थी, उसे कहते दुल्हन परछना. चावल जो हल्दी में रंगे हुए थे. थाली से उठाना और दुल्हन के घूँघट के ऊपर डाल देना. और उसके बाद पैसे देना.

बात मैं इसी की कर रहा हू… यह काम महिलाए करती हैं और नाम लिखने वाला महिला को पहचान उनके पति का नाम लिख देती हैं या फ़िर घर का जो पुरूष मुखिया हो उसका (महिला अपना नाम क्यों नही लिखवाती या लिखने वाला उनका नाम क्यों लिखता यह अलग चर्चा का विषय है) कोई देता है १५१, कोई केवल ५१ तो कोई ११ और कोई ५. हा मुंह दिखाई ५ वो भी इस ज़माने में(जब मुद्रास्फिती ५ से ६ और ६ से ७ और उससे भी आगे भाग रही है ) हा तो दुल्हन को परछने के बाद पास बैठे लड़के को ५ रूपये दिए. लड़के ने पति का नाम लिखने के बाद ५ रुपए लिख दिया. लड़का हैरान परेशान की ये ५ रुपए देने का क्या तुक है.

तो मैं अब तुक समझा दूँ. १२ साल पहले इस घर की महिला ने उस घर की दुल्हन को परछने के बाद ५ रुपए दिए थे. वो बात याद रखते हुए उस घर की महिला ने इस घर में आई दुल्हन को ५ रुपए वापस लौटा दिए.

ये आज भी होता है, मुझे हँसने की वजह मिली सो मैंने सोचा आप भी हंस ले…

तो हमने भी खा ली मैक्रोनी या पास्ता

हमारे घर में पके हुए चावल को भात कहते हैं। अब वहां के भी बच्चों ने भात को चावल बोलना शुरू कर दिया है।

भात, रोटी, दाल, सब्जी खाकर ही बड़ा हुआ हूं। मेहमानों के स्वागत के लिए मीट (मटन), चिकन, मछली और अंडा बनता है।

पनीर का स्वाद मैंने पहली बार किसी ढाबे या होटल में किया होगा। दक्षिण भारतीय खाना भी बाहर खाया था। उसके बाद बर्गर और पित्जा भी। और आज मैक्रोनीएल्बो मैक्रोनी।Macroni

हमारे आफिस में मेरी वरिष्ठ सहयोगी हैं बबिता जी। उन्होंने पूछा मैक्रोनी खाओगे। मैंने तो पहली बार नाम सुना था, मैंने कहा क्या..?

उन्होंने दुबारा कहा, मैक्रोनी।
मैं विस्मित सा देखता रहा।
उन्होंने कहा झारखंडी ही रहोगे। दिल्ली आए हुए कितना समय हो गया और अभी तक मैक्रोनी नहीं जानते।

और फ़िर उन्होंने घर से बनाये हुए मैक्रोनी मुझे खाने के लिए दे दी

बबिता जी को धन्यवाद

तो भईया लोग हमने मैक्रोनी खा ली है, और अभी भी हम झारखंडी ही हैं। मुझे झारखंडी होने में गर्व है।

हम अपनी आदतें बनाते हैं

हम अपने भविष्य को नहीं बनाते, हम अपनी आदतें बनाते हैं और हमारी आदतें ही हमारा भविष्य बनाती हैं- विष्णु कच्छप

देश के नवीनतम राज्य झारखंड के जमशेदपुर में रहने वाले विष्णु ने जेपीएससी की सिविल सेवा की परीक्षा में तीसरे स्थान रहे।

विष्णु की यह उपलब्धि इस मायने में खास है कि वह एक अत्यंत निर्धन परिवार से हैं। विष्णु सात भाई बहनों में सबसे बड़े हैं और शादी शुदा है। यह सारी परिस्थितियां अपने लक्ष्य को पाने के लिए प्रतिकूल हैं लेकिन विष्णु ने अपने साहस से इसे अनुकूल करते हुए इसे पूरा कर दिया पूरी खबर के लिए इसे पढ़े।

खबर सौजन्य: हिन्दुस्तान

                                                         Jpsc boy Vishnu kaschap 

जिंदगी की चाह और जिंदगी की राह

आप जो सोचते हैं वह जिंदगी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जिंदगी नहीं। जिंदगी वह जो आपके साथ हो रहा है।

मेरा कोई दोस्त अपनी अपनी सरकारी बैंक की नौकरी को छोड़ चाट्र्ड अकाउंटेंट की तैयारी करने की सोच रहा है। उसने मुझे बताया, बरबस मेरे मन में ख्याल आया कि..

जो सवाल हर बच्चे से किया जाता है, कभी मुझसे भी किया गया था। क्या बनना चाहते हो। बड़ी धुंधली सी याद है, मैंने कहा, पायलट। प्लेन में उड़ना, इतनी ही समझ थी पायलट को लेकर। और वह पायलट कलम, हमेशा साथ भी तो रखता था। अच्छी यादें हैं।

वह पायलट की याद अब समय के साथ मद्धिम हो रही थी और मेरी पढ़ाई भी। इंजीनियर को लेकर मेरे मन में कुछ अच्छी तस्वीर नहीं बन रही थी और दसवीं पास होने के बाद मैंने कामर्स ले लिया।

गोस्सनर कालेज, रांची की बिल्डिंग बड़ी सुंदर थी उतनी अच्छी मेरी अकाउंटस में समझ नहीं थी। शाम के धुंधलके में हम कुछ दोस्त सीए और सीएस की बातचीत करते थे। वो रुतबा, वो सिग्नेचर की स्टाइल। काफी कुछ लुभाता था। लेकिन दूसरे साल में मैंने यह कहना शुरू कर दिया था कि अकाउंट्स में कमांड नहीं बन रहा है। और पास होते ही हर बिहारी(तब तक झारखंड अलग नहीं हुआ था, उसके दूसरे साल झारखंड अलग हो गया) की तरह यूपीएससी और आईएएस के बीच में सही अंतर जाने हुए भी आईएएस की सोचने लगा। पटना कालेज में एडमिशन के बाद जिंदगी एकदम से तेज हो गई थी जो मेरी पकड़ से बाहर थी। कालेज को छोड़ना पूरी जिंदगी के सोच में शामिल नहीं थी लेकिन जिंदगी में यह शामिल हो गया।

उसके बाद आईएएस की सोच भी छूटी लेकिन दिल्ली का साथ पकड़ लिया इस बीच अर्थशास्त्र से स्नातक पूरी हो चुकी थी।

कहीं काम करते हुए पूरा देश घूम चुका था। कई समझ अंकुरित हो रही थी जो पूरे पेड़ का रूप ले ही रही थी कि दैनिक जागरण में कब आ गया पता भी नहीं चला।

पूरी जिंदगी का मजा ले रहा हूं और जहां पड़ाव मिले वह असल में मेरे लिए पड़ाव नहीं ब्रेकर जैसे थे। मैंने चलना नहीं छोड़ा। और आज सबके सामने हूं।

छोटी नहीं, बड़ी जिंदगी और मजेदार जिंदगी के मजे लीजिए।

यशवंत के बाद के बाद धोनी पहचान बने

Mahendra Singh Dhoni

पहले लोग जब मुझसे पूछते थे कहां के रहने वाले हो मैं कहता था रांची। रांची!!! ऐसे कहते थे लगता हो जैसे रांची भारत में नहीं पाकिस्तान में हो। उसके बाद मैं कहता था वहीं जहां के वित्त मंत्री हैं यशवंत सिन्हा। ओ अच्छा..अच्छा तो आप वहां के हैं। बड़ा बुरा लगता था कि यार इन लोगों को इतना नहीं पता कि रांची कहां है!

समय बदला राजग की सरकार केंद्र से हट गई और यशवंत सिन्हा भी वित्त मंत्री से हट गए। मैं सोचने लगा था कि अब क्या बताऊंगा?

लेकिन अब कोई नहीं रांची का नाम सुनने के बाद दोबारा कोई नहीं पूछता।

वजह, ‘झारखंड रत्न’ से सम्मानित महेंद्र सिंह धोनी रांची के रहने वाले हैं। यह अब सब जानते हैं।

अब लोग यह पूछते हैं कि आपका घर धोनी के घर से कितनी दूर है? हंसी आती है आज भी कि उन्हें रांची तो पता है लेकिन झारखंड नहीं। धोनी उनलोगों को भी बता देगा कि झारखंड कहां है?

धोनी जोहार!!

झारखण्ड में दो नए जिलों का निर्माण

Jharkhand

एक तो रामगढ और दूसरा खूंटी. रामगढ के बारे में कुछ बता दू. यहा पर १९४० में कॉंग्रेस पार्टी का वार्षिक अधिवेशन हुआ था. जिसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलम आजाद ने की थी.  इन दोनों जिलों के निर्माण के बाद झारखण्ड में जिलों की संख्या २२ से बढ़कर २४ हो गई है. यह मेरा नया गृह जिला बन गया है. 

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