राग-ए-बुलेट, राग-ए-यामाहा, राग-ए-बजाज…

Royal Enfield

यह सारे राग तानसेन के राग मल्हार से मिलते जुलते है। इसकी महत्ता को हर गाड़ीवान समझ पाएगा.. कल भी समझता था, आज भी समझ रहा है और समझता रहेगा..। यह गाड़ी प्रेम है। आपके पास कौन सी बाईक है, या थी? उसकी एक आवाज..खास आवाज..खास गंध होती है। इंसान भी समझते हैं और घर का कुत्ता भी..।

एक समय बुलेट का हुआ करता था..क्या शान थी..गांवों, मोहल्लों में पूरे 5-7 किमी तक लोग जानते थे कि फलां बुलेट में चलता है..। लोगबाग तब पूरी दुनिया को दो भाग में बांट देते थे, एक जिसने बुलेट चलाई हो..दूसरा वह जिसने बुलेट नहीं चलाई हो। स्टार्ट करने के नाम पर शर्त लग जाते थे..। लाल और हरे निशान में लगा कांटे को मिलाना फिर डरते-डरते किक मारना..।

बुलेट की आवाज एक किमी तक तो सुनाई पड़ती ही थी। घर की औरतों के लिए वह सायरन का काम करता था। घर के बच्चे पढ़ने लगते थे.. औरतें उस काम या उस कमरे में चली जाती थी, जहां उस वक्त उस समय में उनको होना चाहिए था।

अब मुझे कभी-कभी बुलेट बड़ा ही सामंती लगता है। फिर सोचता हूं.. मंहगाई ने सामंती बुलेट की वाट लगा दी है।

तब बुलेट की सवारी पुलिस या फिर कुछ जमींदार परिवार ही किया करते थे। अलग रौब के साथ..। आज भी लेते उनके ही प्रतीकात्मक लोग ले रहे हैं..लेकिन गाडि़यों की भीड़ ने बुलेट की छवि को थोड़ा धुंधला किया है..

रायल एनफील्ड..यही नाम तो है लेकिन लोग केवल बुलेट जानते थे.. बुलेट

अगली कड़ी में यामाहा आरएक्स 100

आपलोगों को क्या बताऊं, कि ब्लास्ट के बाद क्या-क्या हुआ?

blast

कि एक मृतक परिवार के पिता के आंखों से आंसू नहीं आ रहे
कि मुआवजा लेने के लिए मृतकों को फाइलों में कितनी बार मारा गया
कि राजनेताओं के घर मीटिंग चलेगी, जिसमें आरोप-प्रत्यारोप को लेकर बहस थोड़ी आहिस्ता होगी
कि खून की राजनीति करते नेताओं को शर्म भी नहीं आएगी
कि खून पानी में जा मिला, मानो हमलोग खून और पानी मे विभेद भूल गए हों
कि..
कि..
कि पता ही ना चले कि क्या लिखें….

जो वामपंथी हैं और जो नहीं हैं..

left partiesपिछले दस दिनों में भारतीय राजनीति में जो हुआ उस से मुझे कोई भारी ताज्जुब नहीं हुआ। संसद की लाज किसी ने अगर बचाई तो वह थे अकेले सोमनाथ दा ने। सोमनाथ दा को मेरा नमन। हमारे अच्छे कहलाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जरूर बेदाग प्रधानमंत्री हैं। इसमें किसी को कोई शक-सुबहा नहीं होगा। इसके बावजूद संप्रग के प्रधानमंत्री होने के कारण कई उंगलियां तो उन पर उठेंगी।

 विचारधारा की राजनीति करने वाली पार्टी वाम दलों ने दिखाया कि अब वह भी विचारधारा को ताक पर रख सकते हैं। वाम की विचारधारा में जातिगत राजनीति नहीं हैं। लेकिन..। मायावाती के साथ आगे आकर वाम दलों ने अपने विचारधारा की भी मिट्टी पलीद कर दी।

 विनाश काले..विपरीत बुद्धि..

शंकर सिंह वाघेला, नटवर सिंह जैसे कई बड़े नेता जो कभी भाजपा में होते हैं तो कभी कांग्रेस में तो कभी सपा, बसपा के साथ..। वाम दलों का कोई नुमाइंदा किसी दूसरी पार्टी के साथ नहीं जा मिलता लेकिन सोमनाथ को पार्टी से निकालने के बाद.. शायद ऐसे कई लोग भी होंगे जो अब लेफ्ट से राईट या सेंटर में जाना पसंद करेंगे।

विज्ञापन में औकात की बात

मनोविज्ञान की एक थ्योरी है। आप किसी इंसान की आइडेंटिटी पर कुठाराघात करेंगे और वह अपना आपा खो बैठेगा। दो विज्ञापनों हैं, जो इसी मनोविज्ञान को कैश करने के लिए बनाए गए हैं।

पहला है, बिग बाजार का। लड़की का सामान गिरता है, लड़का उसकी मदद करता है। उसके बाद वह चलने को होता है तो उसके मोबाइल की घंटी बजती है। लड़की उसे कहती, चोर कहती। लड़का कहता है, मेरा है। लड़की कहती है, उसके पहनावे को देखकर कहती है औकात है तुम्हारी।

दूसरा है, यू टीवी का चैनल बिंदास पर आने वाला सीरियल चैम्प की। इसका प्रिंट एड है। कहता है, औकात है तो आगे निकल कर दिखाओ।

बचपन के दिनों से मैं लोगों को सुनता आया हूं। अपने औकात में रहो। जैसे ही कोई इसको कहता, दूसरा बिफर पड़ता। औकात का सीधा मतलब लोग पैसे से लेते हैं। और इन दोनों में पहला विज्ञापन पैसे को लेकर है तो दूसरा इगो को लेकर..। ज्यादातर युवा अपने दूसरे दोस्त से पीछे नहीं रहना चाहते।

मोनिट्री एंड इगो (पैसा और दंभ) का कोम्बिनेशन है यह औकात। इसे लेकर कंपनियां भी कुछ माल बटोरना चाहती हैं।

किसकी और क्या है दिल्ली!

पिछले सात सालों से दिल्ली में रह रहा हूं, इसके साथ 27 साल की उम्र की समझ के साथ जो दिल्ली को देखा, सुना, पढ़ा, उसी मुतालिक कुछ पंक्तियां जोड़ने की कोशिश..

लुटियंस से लेकर केपी सिंह तक..
कितनों ने बनाया और कईयों ने लूटा..
दिल्ली ही घर है..

देश के अलग अलग हिस्सों से आए
उन 750 सांसदों की,
जिन्होंने देश को देने से ज्यादा इससे लिया है

सुप्रीम कोर्ट में हक के लिए लड़ने आए
देश के कई लोगों की भी..
जो लूटे होते हैं और देश का कानून उन्हें और लूट लेता है

थोड़ा व्याकुल, थोड़ा उत्साहित
रोजगार के लिए गांव से आने वाले उस युवक की भी
जो अभी ट्रेन में बैठा भी नहीं है

चौड़े सड़क पर झूम कर चलने वाले
उन नौजवानों की भी
जो वीकेएंड में अखबार का हिस्सा बन जाते हैं

कुकुरमुत्ते की तरह खुले पत्रकारिता में पढ़ने वाले
युवा पत्रकार से लेकर वरिष्ठ पत्रकारों की भी
जो सीवी, फोन और मुलाकात का सिलसिला नहीं छोड़ते

ब्लू लाईन, व्हाइट लाइन, मुद्रिका और बाहरी मुद्रिका
आफिस से परेशान उन लाखों यात्री की भी
जो जवानी का आधा हिस्सा बस में गुजार देते हैं

नार्थ कैम्पस, साउथ कैम्पस और मुखर्जी नगर
पढ़ने आए उन छात्रों की भी
जिनके हाथों में फरवरी में सुर्ख लाल गुलाब नजर आते हैं

एम्स, अपोलो और सफदरजंग आने वाले
बीमार और उन तीमारदारों की भी
जिन्हें खुशियां तो, कभी गम ज्यादा मिलते हैं

बाकि बचे हम साधारण लोग

काम से छूटे
किराए घर में आए
कुंवारा खाने की, विवाहित अन्य परेशानियों में
लग जाता है..
रात को देर से सोना
..फैशन मान लिया जाता है।
कंम्प्यूटर और लैपटाप में खिटिर फिटिर के बाद
पांच बाई साढ़े छ: के बिस्तर में
..आठ बजे जल्दी उठ जाते हैं।
कई रिपोर्ट और कई लेखनी
दिलवालों से लेकर, संवेदनाओं से मरा हुआ
र्ईट और गारे से भरा हुआ
शहर बता चुके हैं।
लोगों कहते हैं..
दिल्ली का मौसम, अपना नहीं है
राजस्थान इसे गर्मी और हिमाचल सर्दी दे जाता है

नेताओं ने इस बात को सुनकर
पूरी दिल्ली को ही शंघाई बनाने का फैसला किया
करोड़ों खर्च किए
सफर, आस्था और जज्बा बढ़ाने वाले
मेट्रो, मंदिर और खेल गांव बनवाए

दिल्ली का दिल धड़कता है-

नेता, आरोपी बेरोजगार और नौजवानों में
पिछे नहीं हैं छात्र, पत्रकार और बीमार

इंडिया गेट, लाल किला, कुतुब मीनार
जनपथ, मोनेस्ट्री और पालिका बाजार
यही है यहां की पहचान
इसी से बढ़ती है दिल्ली की शान

21वीं सदी का शनिवार!!

इस शनि का उदय इसी 21वीं सदी में हुआ है। जब भारत की सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा देर रहने का रिकार्ड बना रही थी। चुपके से शनि भी भारतीय लोगों पर अपनी जगह बना रहा था। नए-नए शनि मंदिर खुल रहे थे। मैं दक्षिण दिल्ली के एक शनि मंदिर को जानता था। आज दिल्ली में ही पांच शनि मंदिर हैं। काला लिबास इसकी पहचान है। आपको अपने शहर के ट्रैफिक लाईट में शनि के भक्त उस बरतन को लिए खड़े मिल जाएंगे, जिससे आप कल तक दूध लाया करते थे। थोड़ा तेल भरा हुआ है। कुछ सिक्के पड़े हुए हैं।

यह शनि वार एक अलग तरीके का शनिवार है। अभी कल ही तो अपने पति को फिजूल की बाईक राईडिंग पर पत्नी ने झिड़की लगाई थी। पेट्रोल की कीमत इतनी बढ़ गई है और आप हैं कि बाईक इधर-उधर डोलाए जा रहे हैं। और आज पत्नी घर से सरसो का तेल कटोरी में निकाल कर दान करने जा रही हैं। महंगाई गई तेल लेने।

21वीं सदी के शुक्रवार को ही मीडिया शनिवारमय हो जाती है। शनि दोस्त है, दुश्मन नहीं। सात माला पहने, लैपटाप रखे पंडित जी दर्शकों के सवालों का जवाब देते दिखते हैं। ग्राफ्कि्स से बताया जाता है कि यह शनिवार कई मायनों में अद्भुत है। दर्शक को समझ नहीं आता कि यह डरने वाला शनिवार है, या खुश होने वाला।

21वीं सदी का शनिवार गांवों तक नहीं पहुंचा है। इसका वार अभी केवल बड़े शहरों तक ही है।

इस शनिवार का गणित के सापेक्ष के फार्मूला की तरह लगती है। Saturday is directly relate to Money। शनिवार को सीधा सीधा मतलब पैसे से है।  आपके पास पैसा है तो आप शनि का वार आप पर हो सकता है। नहीं है तो किसी का वार आप पर नहीं हो सकता है। आप बेकार हैं।

भाजपा या वाम की सरकार होती तो क्या नहीं बढ़ते तेल के दाम?

भाजपा ने कहा, आर्थिक आतंकवाद है यह। माकपा ने अपने तीनों शासित राज्यों में हड़ताल कर दिया है। इस तेल की पाठशाला में क्या फेल हो गए मनमोहन?

राय बनाने से पहले कुछ खबर, जो जरूरी है-
भारत: तेल कीमतों में 10 फीसदी की वृद्धि।

मलेशिया: यहां पेट्रोल 1.92 रिंगेट है। (24 रुपये लीटर) सरकार को तेल की कीमते कम रखने केलिए 55 बीलियन रिंगेट (71400 करोड़ रुपये) की सब्सिडी देनी पड़ती है।

ताईवान: तेल की कीमतों में 13 फीसदी की वृद्धि।

श्रीलंका : 14 से 47 फीसदी तक बढ़ाए गए पेट्रोल और डीजल के दाम।

बांग्लादेश: 37 से 80 फीसदी तक दाम बढ़ाए जाने का प्रस्ताव।

एक महीने की यह गतिविधि कुछ तो समझा ही सकती है।

कच्चा तेल की कीमत में दो महीने में 25 फीसदी से ज्यादा की उछाल।
क्या इन सब को देखते हुए भी किसी को लगता है कि भाजपा या वाम की केंद्र में सरकार होती तो नजारा कुछ और होता.. राय देकर बता ही सकते हैं? क्या पता आपके पास आईडिया हो जो सरकार के पास ना हो…

भारतीय राजनीति को दिखाने वाले शब्द

सेज-सेतु, मंदिर-नंदीग्राम
तेल-खेल, धार-हड़ताल
चुनाव-वोट, भाजपा-कांगे्रस
वाम-धमकी, मान-मन्नौव्वल
नेता-गिरी, नेतागिरी
इस्तीफा-हल्ला, संसद-मछलीबाजार
मीडिया-रिपोर्ट, स्टूडियो-खद्दर
बयान-मुकरना, नीति-अनीति-राजनीति

ढेर सारे शब्द हैं! कुछ आप भी जोड़ दें..

आफिस में काम करने का ढोंग

एमएनसी कंपनियों में काम करने वाले लोग इसे ओपन कम्यूनिकेशन का नाम दे रहें हैं। आफिस में काम करने का ढोंग, एक नया काम बनकर उभर रहा है। हर एक आफिस में आपको कुछ लोग मिलेंगे जो यह काम बखूबी कर रहें हैं। आपको नाम याद आ रहे होंगे। मोनिका, बबिता, गौरव, विकास.. कई सारे नाम आपके दिमा में आ रहे होंगे। आफिस से निकलकर अपने आप को समझदार समझते हैं। गोली दे दिया। ऐसा कुछ भाव लेकर, हंसते-हंसते आफिस से निकलते हैं।

छोटे-छोटे केबिन नुमा आफिस। एक के बगल में दूसरा कंप्यूटर और दूसरे के बगल में तीसरा। कुछ के हिस्से में काम बढ़ गया है। जिनके हिस्से काम बढ़ा है वह सच में काम करते हैं। और कुछ काम का ढोंग करते हैं। उनका काम ही ढोंग करना है। देखकर मालूम होगा कि फलां साहब बहुत काम करते हैं। आठ घंटे की रिपोर्ट मांग ली जाए तो आडवाणी के भाषण की तरह नतीजा निकलेगा सिफर। (आडवाणी जी बोलते ज्यादा हैं, मतलब कम होता है। वाजपेयी जी बोलते कम हैं, मतलब बहुत होते हैं।)

boss and officeआफिस में आने का टाइम और जाने के टाइम दोनो को बीट कर देते हैं। आते लेट से हैं और जाते जल्दी हैं। बास के आने पर सबसे पहले अदब से खड़े होते हैं। टाइम ग्रीट करते हैं। और सामने वाले को कहते हैं, इसको ऐसे कर देना..।

आह.. क्या अंदाज ए बयां है। बास भी कुछ नहीं बोलता है, लेकिन हर बात समझ जाता है। बास बिना कुछ बोले आगे बढ़ जाता है। मैं भी कुछ नहीं बोलूंगा। रेस्ट यू आल नो बेटर..।

यह तो आगाज है.. तेल और तेल की धार

अंजाम के बारे में सोचिए!! कुछ लोग कहेंगे क्या यह आगाज है!! जी हां, यही आगाज है। ऐसे मुद्दे का आगाज ऐसा ही होता है। और अंजाम भी धीरे धीरे ही पता चलता है। बयान आएंगे, काम नहीं होगा।

मेरा घर झारखंड के कोयलांचल क्षेत्र में है। लोग सर्दियों में कोयला जलाकर छोड़ देते हैं। लाखों टन कोयला यूं ही जल जाता है। वहां के लोगों को इसकी आदत हो गई है। इसका मतलब यह नहीं है आने वाले खतरे से वह बच जाएंगे।

कच्चा तेल 135 डालर प्रति बैरल तक जा पहुंचा है।

ऐसी खबरों का तात्कालिक प्रभाव कुछ ही समझ पाएंगे। यह एक देश के एक पार्टी को नुकसान नहीं पहुंचाएगी, इसकी चपेट में घाना से लेकर दक्षिण अफ्रीका और क्यूबा से लेकर अमेरिका तक को होगा। भारत और चीन की स्थिति तो और नाजुक होगी। जीडीपी का सारा गणित भूल जाएंगे यह देश।

अमेरिका अपने तेल के कुंओं को अभी बचा कर रखना चाहती है। ओपेक उत्पादन बढ़ाना नहीं चाहता। नाइजीरिया में आपसी लड़ाई चल रही है। बाजार में स्लो डाउन का अंदेशा लगाया जा रहा है।

लोग सीएफएल की बात कर रहा है। ऊर्जा बचाओ का नारा लगा रहे है। बहुधा को यह बात समझ नहीं आ रही है। यह आप पर नहीं तो आपके बच्चों पर तो असर डालेगी ही, और बच्चे नहीं तो उनके बच्चे।

अगर आप समझ गए तो उर्जा को बचाइये, यह खत्म हो रहा है।