गाना तो केवल लता मंगेशकर गाती है….

कहीं दूर से आवाज आई कि यार क्‍या गाना गाती है….गाना तो केवल लता मंगेशकर गाती है! मैं सोचने लगा कि बाकि के गायक क्‍या करते हैं… आशा भोंसले, कविता कृष्‍णमूर्ति, श्रेया घोषाल और भी ना जाने कितनी….

 ये बात मैं इसलिए लिख रहा हूं कि आज मैंने किसी ब्‍लाग में देखा कि कोई कह रहा था कि ब्‍लागिंग तो केवल आप ही करते हैं बाकि तो सब…. मैं ऐसा नहीं मानता…जिसने कहा उसके ब्‍लाग को लेकर भी नहीं सोचता

 ब्‍लोगिंग सर्वथा निजी चीज है…आप उसमें गीत लिखें या गाली, कार्टून पोस्‍ट करें या बहस करें यह आपका और सिर्फ आपका निजी मामला है और कुछ नहीं….

घर की याद और कुछ बातें झारखंड की

घर से लौट कर आया हूं। जेठ की दुपहरी की तरह हैं अभी घर की यादें। एक दम कड़क। ताजा-ताजा। घर से चलते वक्त का अंतिम खाना.. कौर ठीक से अंदर नहीं जाता। आज भी.. और तब भी होता था जब घर से पहली बार निकला था।

एक जुलाई की रात झारखंड एक्सप्रेस से जा रहा था, दो को घर पहुंचना था लेकिन दो जुलाई को झारखंड बंद, तीन जुलाई को भारत बंद। पहले ट्रेन का रूट बदला और फिर बारिश और बंद ने सुहाने सफर को आह-आउच सा बना दिया।

तीन अहले सुबह किसी तरीके घर पहुंचा। लेकिन घर पहुंचने के बाद किसी तरीके से आह-आउच वाली स्थिति वाह-वाह हो गई। मेरी छह महीने की भतीजी का हंसता हुआ चेहरा जो दिखा। भतीजी का नाम उसकी बुआ ने माही रखा है। पूरा घर माही-माही से गुंजायमान रहता है।
इसी बीच मुझे लग रहा था मैं कुछ मिस कर रहा हूं, सोच रहा था आलोक पुराणिक ने आज संडे स्पेशल यू हीं कुछ लिखा होगा.. अपने डाक्टर साहब(अनुराग जी) ने भी अपने यादों के पेड़ को झकझोरा होगा, कुछ पत्ते सहज रूप से गिरे होंगे। पुराने लेकिन ताजा-ताजा से लगने वाले।
प्रमोद सिंह अजदक वाले ने कुछ आलापा होगा, जिसे मैं एक बार पढ़ता हूं फिर दूसरी बार पढ़ने पर समझ पाता हूं। तब पता चलता है कि कितनी बड़ी बात लिखी गई है। ठीक ऐसे ही ना जाने कितनों के बारे में सोचा और अपने दोस्तो को बताया..।

इन सब पलों में मेरा कैमरा मेरे साथ था। फोटो लिए, फ्लिकर पर अपलोड किया। मेरे पत्रकार दोस्त ने इसे देखकर कहा, मैंने ऐसी हरियाली तो कहीं देखी ही नहीं है। मैंने कहा झारखंड के नाम में हरियाली है। झार=झाड़=झाडि़यां, पेड़-पौधे.. rajeshroshan

झारखंड के बनने से बहुत कुछ बदल गया है। बहुत कुछ..। इस अमीर राज्य के गरीब जनता के साथ कितना अच्छा हो रहा है कितना बुरा..यह एक अलग बहस का हिस्सा है।

मेरे लिए तो मेरा झारखंड जैसा भी अच्छा है। कई बुराईयां जिसे मिटाना होगा। झारखंड बंद झारखंड का सबसे सफल हथियार सा नजर आता है। इसे बदलना होगा। कब और कैसे इसका मुझे ज्ञान नहीं लेकिन इतना पता है कि इस अमीर राज्य के लोगों को दिल से, मन से और जेब से अमीर बनना है तो झारखंड बंद को बंद करना होगा।

सभी हिंदी ब्लागरों के लिए

एक गूगल समूह है। चिट्ठाकार। कई हिंदी ब्लागर आज भी उसके सदस्य नहीं हैं। शायद इसकी जानकारी ही नहीं है। इसका हिस्सा बनिए। अपनी राय दीजिए। दूसरों को भी जानिए। इसका सदस्य बनने से पहले इसके इस समूह का चार्टर जरूर पढि़ये। इस समूह के नियम बहुत कड़े हैं। लेकिन चूंकि समूह अच्छा है इसलिए आप सभी लोग इसका हिस्सा बनिए। सदस्य बनने के लिए इस लिंक में क्लिक कर अपना मेल आईडी और पासवर्ड के साथ लोगिन कीजिये ।

आप थोड़े बोर हो सकते हैं क्योंकि कभी-कभी इसमें हिंदी से जुड़ी तकनीकि जानकारियां पूछी जाती है। जो सहज रूप से समझ में आने वाली नहीं होती। बावजूद इसके यह समूह अच्छा है।

हिंदी ब्लाग का दूसरा चरण कब आएगा?

ब्लाग शब्द को मैंने पहली बार 2004 में सुना था। टाइम्स आफ इंडिया के किसी लेख में। जिक्र था कि ब्लाग कीवर्ड को अमेरिका में सबसे ज्यादा लोगों ने सर्च किया था। उसके कुछ समय बाद हम भी ब्लाग व‌र्ल्ड में कूद पड़े, जैसे आज अमिताभ और लालू यादव पड़े हैं। वर्डप्रेस में ब्लाग बनाया, अपना डोमेन लिया.. कमेंट मिले. दिया।

मुझे यह हिंदी ब्लाग का पहला चरण लगा और यह पिछले तीन या कहूं चार सालों से निरंतर चला आ रहा है। हिंदी ब्लागरों की संख्या तिहाई से निकलकर चार अंकों तक पहुंच गया, ठीक वैसे ही जैसे महंगाई इकाई अंक से निकलकर दहाई अंक में पहुंच गया। यहां कुछ भी लिखो बधाई, साधुवाद, बढि़या, बेहतरीन जैसे ही पर्यायवाची शब्द कमेंट के रूप में आपको मिलेंगे। कुछेक अनामी भाई बंधु जन आपको कभी गरियाते मिल जाएंगे तो कभी आलोचना करते हुए।

Hurdle race

मैं दूसरे चरण की बात करना चाहता हूं जब लोग आलोचना करें तो नाम लेकर। अपने नाम से रजिस्टर कर आलोचना करें। ब्लाग से मोडरेशन को करीब-करीब हटा दिया जाए। खास-खास विषयों से जुड़े ब्लाग बने, जो धीरे-धीरे दिख रहे हैं। नेताओं की तरह आरोप-प्रत्यारोप ना करें। ब्लाग को अपने लिए लिखें। एग्रीगेटर से जुड़े हमारे-आपके लिए नहीं।

इंटरनेट के लिए एक बात हमेशा याद रखें। कंटेंट इज किंग। आप अच्छा लिखेंगे। कल, परसों, महीने क्या सालों बाद आपकों पढ़ेंगे। आप अच्छा नहीं लिखेंगे तो आप किसी को लिंक भेज दीजिए, बधाई, बेहतरीन का एक कमेंट देकर चलता निकलेगा। आप खुद सोचिए, क्या आपके लिखे लेख का दस साल बाद कोई मतलब रहेगा? या फिर ऐसे लेख जिसे कोई अंजान पढ़ेगा, उसे समझ पाएगा। हिंदी ब्लाग में चलने वाली लड़ाइयों को वही समझ पाएंगे, जो इन पर नजर रखे हुए हैं। एक हफ्ते बाद इनकी सार्थकता नगण्य हो जाएगी। फिर अपनी रोशनाई बरबाद करने को क्या फायदा!

हिंदी ब्लाग को भी बदलाव की जरूरत है। इस दूसरे चरण का आगाज हम आपको ही करना होगा।

हिंदी ब्लाग के सचिन तेंदुलकर

बड़ा कौतूहल का विषय है। पहले सचिन तेंदुलकर के बारे में कुछ बात करूं। जीते जिंदगी महान कम ही लोग बनते हैं और अगर बन भी गए तो विवाद उनका साथ नहीं छोड़ते। सचिन ने अपने को ऐसे सांचे में ढाला जिसमें महानता सादगी सा मालूम हो और विवाद.. एकदम नहीं। इसलिए नहीं कि विवाद से सचिन बचना चाहते हैं बल्कि सचिन को विवाद पसंद नहीं है। अपना लैंडमार्क सेट करते हैं। कोई यह नहीं कहेगा कि सचिन उसके जैसा लगता है। हमेशा सचिन की तरह ही कोई लगेगा!

अपने शीषर्क पर लौटूं। हिंदी ब्लांगिंग का सचिन तेंदुलकर कौन? एक दम से नाम निकलकर आएगा, उड़न तश्तरी! समीर जी का। Sameer Lalकनाडा में रहते हैं, भारतीय हैं। पेशा लोगों को सलाह देने का है, मतलब किसी फर्म में फाइनेंशियल सलाहकार हैं। विवाद से बचते नहीं हैं, विवाद इन्हें पसंद नहीं है। अपने पोस्ट पर आए एक हुश हुश नागराज की टिप्पणी पर पोस्ट लिख डाला। बेहद ही नपा तुला शॉट (शब्द)। देखने (पढ़ने)वाला वाह! वाह! करता है। कोई इन्हें टिप्पणी सम्राट कहता है, तो कोई हिंदी ब्लागिंग के साधुवाद पुरोधा। सचिन तेंदुलकर जैसे अपने जूनियर का हौसला बढ़ाते दिखते हैं, ठीक इसी तरह इनकी टिप्पणियां नए ब्लागरों का हौसला बढ़ाती है। इनके पोस्ट पर आने वाली टिप्पणियों की संख्या से आप इनके प्रशंसकों का अंदाजा लगा सकते हैं। रैनडमली किसी भी पोस्ट को उठा कर देख लीजिए। आपको अंदाजा हो जाएगा। समीर इज सिम्पली आउटस्टैंडिंग। लगे रहिए। आपके एक-एक पोस्ट के लिए आपको मेरे और सभी आपके चाहने वाले ब्लागरों की तरफ से आपको साधुवाद।

मैं तुझे मीर कहूं तू मुझे गालिब

मेरे एक ब्लागरोल का नाम है। इसके मुतालिक अनुभवी ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने एक पोस्ट लिखा। बड़ा अच्छा पोस्ट लिखा है। पाठकगण आप लोग भी इसे पढ़े।

पूरा पोस्ट मैंने भी पढ़ा, वहां टिप्णणी देने के बजाए, सोचा एक पोस्ट लिख देता हूं। लिखने लगा तो दो शे’र याद आने लगे। शायर का नाम याद नही. किसी पाठक को पता हो तो जरुर बताये. अग्रिम धन्यवाद आप भी पढे़,

कहां से आ गई दुनिया कहां, मगर देखो
कहां-कहां से अभी भी कारवां गुजरता है।

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बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ जिंदगी, हम दूर से भान लेते हैं।

हिन्दी वर्तणी जांचक.. भविष्य में कईयों को पंगु बना देगा

अभी मैं विश्व की दस बड़ी समस्याओं के बारे में लिख रहा हूं कि एक हिंदी की आने वाली समस्या दिख गई। रवि रतलामी जी ने आज एक उपयोगी मशीनी हिन्दी वर्तणी जांचक से परिचय कराया। यह जितना उपयोगी होगा उतना ही दुरुपयोगी। इसका उपयोग कई हिंदी ब्लागर भी करेंगे। अभी भी कर रहे होगें। यह ठीक उस तरीके से जैसे गणित हल करना मत सीखो, कुंजिका से देख कर बना लो।

इसका उपयोग शुरुआती रूप हिंदी लिखने के लिए ठीक है, वह भी उनके लिए जो हिंदी भाषी या हिंदी की पढ़ाई नहीं की है। इसका उपयोग अगर हम आप हिंदी ब्लागर भी करने लगे तब तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे बच्चे हिंदी का एक शब्द भी ठीक से नहीं लिख पाएंगे। जैसे अभी तक तो स्कूलों में अच्छे हैंड राईटिंग की बात की जाती है, लेकिन कंप्यूटर आने के बाद कौन बच्चा अच्छे हैंड राईटिंग के लिए अभ्यास करेगा?

इसका इस्तेमाल उतना ही करें जितना जरूरी हो, वरना हम हिंदी को जितना बनाएंगे नहीं उससे कहीं ज्यादा नाश कर देंगे।

अगर इसका कोई और जबरदस्त फायदा वाला नजरिया बता पाए तो मुझे खुशी होगी।

क्या अब भी दिल्ली में हिंदी ब्लागर्स मीटिंग हो पाएगी?

संभावना कम है। हो जाए तो शायद कुछ बर्फ पिघले!! बड़े-बड़े बर्फ जम रहे हैं। अंदर की गर्मी इतनी तेज की बर्र्फो की शिलाएं जमती जा रही है।

ब्लागरों की संख्या बढ़ रही है। लोग एक दूसरे को नहीं जानते। इसके बावजूद एक का दूसरे के प्रति संवेदनाएं बहुत हैं। और इससे उलट भी लोगों में एक से दूसरे के प्रति गुस्सा भी बढ़ रहा है।

अभी साहित्यकारों की लड़ाई से निकल भी नहीं पाए थे कि और कुछ और “असुरों” (दानव नहीं, सुर वाले का उल्टा करने के लिए बेसुर की जगह असुर)की लड़ाई शुरू हो गई। लगे राग अलापने। 

अपनी इतनी ऊर्जा लगा देतें हैं कि इसके लिए नया ब्लाग तक बना दिया जाता है। आप सोचे क्या मिलता होगा इससे!! इगो सटिसफाई कर सकते हैं, इससे तिनका ज्यादा नहीं मिलेगा।

जितनी घटिया बातें हो सकती हैं, यहां हो जाती है। क्या-क्या नहीं होता? गालियां दी जाती हैं। एक दूसरे को टारगेट करके पोस्ट लिखे जाते हैं। कभी नाम से तो कभी बेनाम से टिप्पणियां की जाती हैं।

अब जरूरत आन पड़ी है कि एक ब्लागर मीटिंग हो और ढेर सारे ब्लागर इसमें शिरकत करें लेकिन अफसोस अब यह नहीं हो पाएगा..

धैर्य ब्लागर धैर्य

साहित्यकार यहीं भिड़ पड़े हैं।
ब्लागर मजे लिए जा रहें हैं।
शब्दों के बाण चलाए जा रहें हैं।

संज्ञा से विशेषण तक।
हिंदी से अंग्रेजी तक।
यह पिटा, वह पीटा चल रहा है।

बुद्धिजीवी का तमगा लगाए,
उपदेश दिये जा रहें हैं।

जिनसे उम्मीद थी बनाने की
वही घर ढहाये जा रहे हैं।

धैर्य ब्लागर धैर्य

हिन्दी ब्लोग्गिंग का झगडा झंझट

बाबू जी हिन्दी का ही शब्द है, बना है बा और बू से. बा मतलब एक जगह रहने वाला और बू का मतलब दुर्गन्ध. (अगर और कुछ होता है तो जानना जरुर चाहूँगा लेकिन फिलहाल इस पोस्ट के लिए यही सही है). हिन्दी ब्लोग्गिंग दुनिया में अजित जी, घुघूती जी, समीर जी, अफलातून जी को पढ़कर जितना शुकून मिलता है. उतना ही दुर्घंद फैलाने वाले बाबू लोग भी हैं यहा. गुट बाजी, पैंतरे बाजी खूब होती है. कोई गाली बक रहा तो कोई पढ़ रहा है.

फ़िर कहेंगे हिन्दी का विकास नही होता. उर्जा सीमित है, अपनी उर्जा कही और लगा देंगे तो हिन्दी का विकास कहा से करेंगे!!!

सबसे खास बात. हैं यहाँ सब तुर्रम खा. इससे कम तो कोई अपने को समझता ही नही है.

कोई पोस्ट लिख कर गाली देता है तो कोई कमेंट लिख कर. बकरी की लेंडी से लेकर उपदेश तक की बातें होती हैं. मैं तुझे मीर कहू, तू मुझे गालिब का खेल तो बहुत पुराना है यहाँ का. इसी में अपनी उम्र और उर्जा दोनों का नाश कर देंगे

(नही लिखने की इच्छा होते हुए भी यह पोस्ट लिख दिया) इसके बारे में आप लोग सोचे जरुर.