सरकार राज, क्यों जाए कोई दर्शक देखने?

Sarkar raj posterतेज बजता बैकग्राउंड म्यूजिक, क्लोजअप कैमरा, अंधेरे कमरे में बातचीत। पूरी फिल्म में यही तीन चीजें सबसे ज्यादा मिलेंगी। फिल्म का अंतिम संवाद, अनिता राज (ऐश्वर्या राय बच्चन) बोलती हैं, एक कप चाय देना..। जिस राजनीति को इतना गंदा और “काला”  दिखाया गया है उसे अनिता कुछ ही दिनों में समझ जाती है.

कैलाश खेर की आवाज में फिल्म की थीम की तरह बार-बार गूंजती है..
साम, दाम, दंड, भेद।
साम, दाम, दंड, भेद ..

राजनीति का काला चेहरा दिखाने वाली फिल्म सरकार राज पिछली फिल्म सरकार से 19 है। शायद 18..।

फिल्म के पोस्टर में अभिषेक बच्चन अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या के बीच में दिखते हैं। लगता है कि अभिषेक को प्रोमोट करने के लिए फिल्म बनाई गई है लेकिन सशक्त भूमिका वाला शंकर नागरे का किरदार भी अभिषेक वैसा नहीं कर पाए, जैसा उनके फैन उनसे उम्मीद रखते हैं।

गोविंद नामदेव और सय्याजी शिंदे भी नकारात्मक भूमिका में नहीं जमे। एक पल को तो लगता है कि फिल्म को बच्चन परिवार को दिखाने के लिए बनाया गया है, या फिर इसके निर्माता अमिताभ बच्चन हैं।

महाराष्ट्र में एक पावर प्लांट लगना है और उसको लेकर हो रही राजनीति के ताने बाने के चारो तरफ घूमती है, सरकार राज। फिल्म शुरुआती हफ्ते में बच्चन परिवार के कारण थोड़ी जरूर भीड़ खींच ले जाए लेकिन इसके बाद सरकार राज को कोई भी सरकार (डिस्ट्रिब्यूटर) नहीं रखना चाहेगी।
 

आमिर और “शाहरुख़” ब्लॉग पर और टिप्पणियों में गालियों की बौछार

ब्लॉग का नशा आप और हम पर ही नही है यह आज कल बॉलीवुड भी पहुँच चुका है. आमिर खान तो पिछले साल भर से ब्लॉग लिख रहे हैं अमित जी ने अभी शुरू किया है. कई और  सेलिब्रिटी भी लिखते हैं.

आमिर के नए ब्लॉग पर “शाहरुख़” को जगह मिली है. अपने किंग खान शाहरुख़ नही, आमिर खान के पंचगनी में जो कुत्ता है, उसका नाम है शाहरुख़. पूरा ब्लॉग क्या है वो तो आप यहाँ पढ़ लीजिये लेकिन जो टिप्पणिया मिली है और बिना मोदेरेशन के वह टिप्पणिया पड़ी है. वो काबिले गौर है. टिप्पणिया नही हैं या तो प्रशंसा है या फ़िर गालिया. आमिर को गालिया, उनकी पत्नी किरण को गालिया.

ये गालिया भड़ास हैं या फ़िर पोस्ट आप पढ़ कर सोचे और समझे 

तो अमिताभ बताएं कैसे उत्तर प्रदेश में है जुर्म कम!!?

Amitabh Bachchan

देश की दशा और दिशा बदलने के लिए भारत में दो कानून बने। और सच में दोनों कानून कुछ हद तक अपना काम कर रही हैं। पहला है राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना। दूसरा है सूचना का अधिकार।

दोनों कानून का प्रभाव भरपूर है। एक गरीबों के उत्थान के लिए है, जिसका फर्क तो दिख रहा है लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए। लेकिन मुझे विश्वास है कि एक दिन इसका असर ताजमहल की चमक की तरह ही दिखेगा। दूसरे कानून का मैं एक क्रांतिकारी कानून की तरह देखता हूं। इससे सभी सरकारी महकमा त्रस्त है। सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री कार्यालय और यूपीएससी ने अर्जी देकर कहा है कि हमें सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत ना लाया जाए। यह है इसका प्रभाव। अच्छी बात यह है कि इसे माना नहीं गया है।

खैर मैं बात कर रहा था सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की, जो क्रिकेट मैचों के ब्रेक के दौरान ठंडा तेल, चाय तो कभी जोड़ों के दर्द का बाम बेचते नजर आते हैं। यही अमिताभ बच्चन सात-आठ महीनों पहले टीवी पर यूपी है दम क्योंकि जुर्म है यहां कम.. कहते नजर आते थे।

भारत का कोई नागरिक सूचना के अधिकार के कानून के तहत यह जानना चाहता है कि..
अमिताभ किस आधार पर यह बात कहते थे?
वह केंद्रीय रिपोर्ट कब की बनी हुई है?
उसमें कौन-कौन से राज्य शामिल हैं?
जुर्म का आधार कब से कब तक का लिया गया है?
और..
इस प्रसारण के लिए अमिताभ को कितना पारिश्रमिक मिला था?

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सब अमिताभ से तत्कालीन उत्तर प्रदेश विकास परिषद के सदस्य होने के नाते पूछा गया है। जवाब 15 अक्टूबर को देना है।

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