कई बार बदल देती है यह.. जिंदगी भी

frozen emotions

उस नमक को भी खरोंचा था
बड़ा मीठा सा स्वाद था
जो आज भी है तुम्हारे.. चेहरे पर

कितना खरचा था
और ना जाने कितना खरच होगा
तेरी याद में मेरे.. आंसू

सालती है
वह हंसी और खुशी
जब अब मिली.. जुदाई

कि अब हमने सीखा
मौसम बदलने का मतलब
कई बार बदल देती है यह.. जिंदगी भी

जो वामपंथी हैं और जो नहीं हैं..

left partiesपिछले दस दिनों में भारतीय राजनीति में जो हुआ उस से मुझे कोई भारी ताज्जुब नहीं हुआ। संसद की लाज किसी ने अगर बचाई तो वह थे अकेले सोमनाथ दा ने। सोमनाथ दा को मेरा नमन। हमारे अच्छे कहलाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जरूर बेदाग प्रधानमंत्री हैं। इसमें किसी को कोई शक-सुबहा नहीं होगा। इसके बावजूद संप्रग के प्रधानमंत्री होने के कारण कई उंगलियां तो उन पर उठेंगी।

 विचारधारा की राजनीति करने वाली पार्टी वाम दलों ने दिखाया कि अब वह भी विचारधारा को ताक पर रख सकते हैं। वाम की विचारधारा में जातिगत राजनीति नहीं हैं। लेकिन..। मायावाती के साथ आगे आकर वाम दलों ने अपने विचारधारा की भी मिट्टी पलीद कर दी।

 विनाश काले..विपरीत बुद्धि..

शंकर सिंह वाघेला, नटवर सिंह जैसे कई बड़े नेता जो कभी भाजपा में होते हैं तो कभी कांग्रेस में तो कभी सपा, बसपा के साथ..। वाम दलों का कोई नुमाइंदा किसी दूसरी पार्टी के साथ नहीं जा मिलता लेकिन सोमनाथ को पार्टी से निकालने के बाद.. शायद ऐसे कई लोग भी होंगे जो अब लेफ्ट से राईट या सेंटर में जाना पसंद करेंगे।

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