अकेला बैठा कुछ सोच रहा था, तभी बालकनी में अखबार के गिरने से उसका ध्यान भटका। ..हर सुबह कुछ ऐसा ही होता था। दिल्ली उसके सोच का शहर नहीं है। बड़े-बड़े माल में घूमने वाले लोग और वहां की रखी गई करीने से चीजें.. उसे क्यों पता नहीं बड़ी बेतरतीब समझ आती है।

लोगों का आपस में कोई जुड़ाव नहीं.. दो लड़कियां शापिंग कर रहीं हैं, तीन और लड़कियां शापिंग कर रही हैं, दो लड़कियों और दो लड़कों का समूह उसी दुकान में जाता है। कोई मेल नहीं.. सारी..ओह इट्स ओके जैसे शब्द मिल जाते हैं। कभी-कभी तो समझ हीं नहीं आता कि यह सुव्यवहार माल के अंदर ही क्यों निकलता है। कभी उसे भले रिक्शे पर क्यों नहीं आ जाता जो उसे माल तक लेकर आया?

यह गांवों के लिए माल संस्कृति है जो दिल्ली आकर माल कल्चर बन जाती है। यह कल्चर बालों में लगाने वाले जेल की तरह है, जो शुरू-शुरू बालों को आपके मन माफिक बनाता है लेकिन बाद में बाल बड़े रुखे से हो जाते हैं।

ऐसा ही रुखा एहसास सुबह-सुबह उसे हो रहा था। जिंदगी के कई एहसासों की तरह उसका यह एहसास भी कहीं उसकी आदत ना बन जाए। यह डर उसके अंदर कहीं दूर करवट लिए बैठा था।