पिछले सात सालों से दिल्ली में रह रहा हूं, इसके साथ 27 साल की उम्र की समझ के साथ जो दिल्ली को देखा, सुना, पढ़ा, उसी मुतालिक कुछ पंक्तियां जोड़ने की कोशिश..

लुटियंस से लेकर केपी सिंह तक..
कितनों ने बनाया और कईयों ने लूटा..
दिल्ली ही घर है..

देश के अलग अलग हिस्सों से आए
उन 750 सांसदों की,
जिन्होंने देश को देने से ज्यादा इससे लिया है

सुप्रीम कोर्ट में हक के लिए लड़ने आए
देश के कई लोगों की भी..
जो लूटे होते हैं और देश का कानून उन्हें और लूट लेता है

थोड़ा व्याकुल, थोड़ा उत्साहित
रोजगार के लिए गांव से आने वाले उस युवक की भी
जो अभी ट्रेन में बैठा भी नहीं है

चौड़े सड़क पर झूम कर चलने वाले
उन नौजवानों की भी
जो वीकेएंड में अखबार का हिस्सा बन जाते हैं

कुकुरमुत्ते की तरह खुले पत्रकारिता में पढ़ने वाले
युवा पत्रकार से लेकर वरिष्ठ पत्रकारों की भी
जो सीवी, फोन और मुलाकात का सिलसिला नहीं छोड़ते

ब्लू लाईन, व्हाइट लाइन, मुद्रिका और बाहरी मुद्रिका
आफिस से परेशान उन लाखों यात्री की भी
जो जवानी का आधा हिस्सा बस में गुजार देते हैं

नार्थ कैम्पस, साउथ कैम्पस और मुखर्जी नगर
पढ़ने आए उन छात्रों की भी
जिनके हाथों में फरवरी में सुर्ख लाल गुलाब नजर आते हैं

एम्स, अपोलो और सफदरजंग आने वाले
बीमार और उन तीमारदारों की भी
जिन्हें खुशियां तो, कभी गम ज्यादा मिलते हैं

बाकि बचे हम साधारण लोग

काम से छूटे
किराए घर में आए
कुंवारा खाने की, विवाहित अन्य परेशानियों में
लग जाता है..
रात को देर से सोना
..फैशन मान लिया जाता है।
कंम्प्यूटर और लैपटाप में खिटिर फिटिर के बाद
पांच बाई साढ़े छ: के बिस्तर में
..आठ बजे जल्दी उठ जाते हैं।
कई रिपोर्ट और कई लेखनी
दिलवालों से लेकर, संवेदनाओं से मरा हुआ
र्ईट और गारे से भरा हुआ
शहर बता चुके हैं।
लोगों कहते हैं..
दिल्ली का मौसम, अपना नहीं है
राजस्थान इसे गर्मी और हिमाचल सर्दी दे जाता है

नेताओं ने इस बात को सुनकर
पूरी दिल्ली को ही शंघाई बनाने का फैसला किया
करोड़ों खर्च किए
सफर, आस्था और जज्बा बढ़ाने वाले
मेट्रो, मंदिर और खेल गांव बनवाए

दिल्ली का दिल धड़कता है-

नेता, आरोपी बेरोजगार और नौजवानों में
पिछे नहीं हैं छात्र, पत्रकार और बीमार

इंडिया गेट, लाल किला, कुतुब मीनार
जनपथ, मोनेस्ट्री और पालिका बाजार
यही है यहां की पहचान
इसी से बढ़ती है दिल्ली की शान