साहित्यकार यहीं भिड़ पड़े हैं।
ब्लागर मजे लिए जा रहें हैं।
शब्दों के बाण चलाए जा रहें हैं।

संज्ञा से विशेषण तक।
हिंदी से अंग्रेजी तक।
यह पिटा, वह पीटा चल रहा है।

बुद्धिजीवी का तमगा लगाए,
उपदेश दिये जा रहें हैं।

जिनसे उम्मीद थी बनाने की
वही घर ढहाये जा रहे हैं।

धैर्य ब्लागर धैर्य