इत्र केवल मुसलमान लगाते हैं।
मुसलमान भारत को नहीं पाकिस्तान को पसंद करते हैं।
बिहारी चालाक और राजनीति करने वाले होते हैं।
सभी लड़कियां सेक्सी होती हैं।
पुलिस हमेशा खराब होता है।
नेता कभी वादा नहीं निभाते।
औरतें खूब बोलती हैं।
युवा लड़कियां मोबाइल फोन पर सबसे ज्यादा बात करती हैं।

मैं ऐसा नही सोचता। कैसे? पूरा पोस्ट पढ़िये।

चांदनी चौक में रहने वाले शर्मा जी दरीबां की एक छोटी सी दुकान से अपने एक रांची दोस्त (जो दूसरे शर्मा जी हैं) के लिए इत्र खरीदतें हैं। अपने रांची प्रवास के दौरान शर्मा जी सबकुछ भूल जाएं, इत्र नहीं भूलते।

इत्र कोई भी लगा सकता है। शर्मा जी भी और अख्तर साहब भी।

अखबार के एक दफ्तर में पहले ट्वेंटी-20 फाइनल का टीवी में प्रसारण चल रहा था। मुकाबला था इतिहास में एक ही देश कहलाने वाले और वर्तमान के तथाकथित दो दुश्मनों देशों के खिलाफ। मैच का अंतिम ओवर धोनी के चहेते जोगिंदर शर्मा कर रहे थे.. आखिरी गेंद.. और भारत मैच जीत गई। पाकिस्तान हार गया। दफ्तर में शांत रहने वाले मुसलमान नियाज ने हिंदू सोभन का गाल चूम लिया। ..और पैसे मिलाकर मिठाई मंगाई गई लेकिन मुसलमान नियाज ने सबसे ज्यादा 100 रुपये मिलाए।

भारतीय मुसलमान भारत को प्यार करते हैं और वह भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े प्रशंसकों में से एक होते हैं।
यूं तो इस आफिस में भी कुछ नया नहीं था। कुछ भी नया नहीं था से मेरा मतलब कि दिल्ली के हरेक आफिसों की तरह इसमें भी बिहारियों की संख्या सबसे ज्यादा थी। कोस्मोपोलिटन दिल्ली में वह कोस्मोपोलिटन पत्रिका नहीं पढ़ते। प्रवीण झा भी इसी आफिस का हिस्सा है। मध्यम वर्ग परिवारों में होने वाले मूल्यों को लेकर चलने वाला। आफिस में उसे लोग कभी-कभी झा.अुआ कह कर पुकारते। इसका तुक तो प्रवीण को भी नहीं समझ में आता। झा को झा.अुआ कहना, समझ से परे की चीज है। उसकी प्रकृति उसकी निजी थी, किसी प्रांत और इलाके से अलग(सभी की प्रकृति उसकी निजी व्यवहार पर ही होती है, प्रांत और इलाके से अलग)।

बिहारी भी सीधे होते हैं और राजनीति को समझते हैं और नहीं भी समझते।

तीसरे माले में रहने वाले कुछ लड़के तो सड़क से आने जाने वाली हर लड़की को सेक्सी कहते। उनके जेहन में लड़कियां सेक्सी ही होती हैं, जैसा कुछ बैठा हुआ है।

बस में चलते हुए उसी तीसरे माले में रहने वाले एक लड़का, विकास का सामना एक लड़की से हुआ। जिसके बाद वह बस से यह बुदबुदाते हुए उतरा, इसके तो सिंग उगे हुए थे, लड़ने को ही घर से निकली थी।

हुआ कुछ यूं था। बस ने हल्का हिचकोला खाया और विकास का जूता, लड़की के बस की फर्श पर रगड़ खा रही दुप्पटे को खिंच गया (अनजाने में हुआ था यह)। दुप्पटा पूरा नीचे। लड़की ने उसे देखते हुए कहा, आंखे नहीं हैं क्या? देख कर नहीं खड़े हो सकते हैं क्या?
अगले स्टाप पर बस में भीड़ थोड़ी और बढ़ गई। बस ने एक हिचकोला और खाया। विकास लड़की से टकराते-टकराते.. टकरा ही गया। कुछ अंग्रेजी और हिंदी, लड़की ने विकास को इतना सुना दिया कि सभी यात्री विकास को ही देखने लगे। अगला स्टाप विकास का स्टाप था। वह कुछ बुदबुदाते हुए उतर रहा था।

बाकी की बातें अगले पोस्ट में लिखूंगा