अभी मैं इस गाने को ४ बार सुन चुका हू. कभी ये भी समय था की ऐसे गाने सुनने वालो को मैं अजीब तरीके से देखा करता था. आज मुझे मेरा भतीजा मुझे उसी नजरो से देखता है. उसकी आंखो में मैं वही भाव देखता हू जो कभी मेरी आंखो में हुआ करता था. क्या समय था और क्या समय है!!! :) :) सच में बड़ी अजीब सी दुनिया है कभी जिससे आप नफरत कर रहे होते हैं कभी उसी से प्यार हो जाता है. ये गाना कुछ वैसा ही है. मेरे ब्लोगिन्ग में आने का भी यही एक कारन है की जो मैं आज लिख रहा हू वो साल भर बाद क्या होगा. उसे पढने में बड़ा मजा आता है. खैर इन सब बातो को छोड़िये इस गाने का मजा लीजिये. ११६ चाँद की राते और वो तुम्हारे कंधे पर काला तिल. गुलज़ार साहब भी…. :)